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सम्मान की राह देखता ‘कलम के सिपाही’ का घर, स्मारक

उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित छोटे से गांव लमही में साहित्य सम्राट मुंशी प्रेमचंद के नाम एक स्मारक और पुस्तकालय है, लेकिन उनके घर और स्मारक को आज भी देश वह सम्मान नहीं दे सका, जिसके वे हकदार हैं। मरम्मत के बाद घर का उद्घाटन तक नहीं हुआ। पुस्तकालय भी निजी संस्थान की देन हैं। बेंगलूरु में हिन्दी के एक प्रोफेसर डॉ. विनयकुमार यादव और उनके विद्यार्थियों ने लमही में मुंशीजी के घर को शोधार्थियों के लिए विकसित करने का अनुकरणीय प्रयास किया, मगर कलम के इस धनी का पैतृक गांव और आवास आज भी सरकारी उपेक्षा का शिकार है। आवास को कभी संग्रहालय के तौर पर विकसित करने के दावे किए गए थे, किन्तु यह वीरान पड़ा है। साहित्य के इस पुरोधा की आज जयंती है।

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Munshi Premchand

सम्मान की राह देखता 'कलम के सिपाही' का घर, स्मारक

ऐसे संवरा घर, एक लाख से भी अधिक हस्ताक्षर
घर की मरम्मत के लिए प्रो. विनय यादव ने छात्राओं के साथ मिलकर बेंगलूरु के अलग-अलग कॉलेजों का दौरा कर एक लाख से भी अधिक विद्यार्थियों और हिंदी प्रेमियों के हस्ताक्षर लिए। प्रो. यादव ने इसके बाद उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायमसिंह यादव के नाम एक लाख हस्ताक्षर की प्रति के साथ एक पत्र भेजा। पत्र में उन्होंने लमही स्थित घर की जर्जर स्थिति का जिक्र करते हुए उसकी मरम्मत करवा कर संग्रहालय में बदलने की अपील की। साथ ही वहां एक पुस्तकालय बनाने की भी मांग की, जिसमें देश-दुनिया से आने वालों के लिए प्रेमचंद का साहित्य उपलब्ध हो। प्रो. यादव बताते हैं कि शुरुआत में उनकी मुलाकात मुलायम सिंह से नहीं हो पाई, लेकिन उनके पत्र के आधार पर वर्ष 2006 में मुख्यमंत्री ने उन्हें इस संबंध में बैठक में भाग लेने के लिए लखनऊ आमंत्रित किया और उनकी मांगें जल्द पूरा करने का आश्वासन भी दिया। प्रोजेक्ट के लिए मुलायम सिंह ने एक करोड़ रुपए के साथ दो एकड़ जमीन भी उपलब्ध करवाई। हालांकि सरकार बदलने के बाद यह प्रोजेक्ट करीब 5 वर्ष तक लटका रहा। दोबारा जब समाजवादी पार्टी की सरकार बनी, तो वर्ष 2013 में किसी कार्यवश बेंगलूरु आए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से उन्होंने मुलाकात की और प्रोजेक्ट की ओर उनका ध्यान आकर्षित किया। अखिलेश की पहल पर दिसम्बर 2014 में काम फिर से शुरू हुआ।