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हमारी संस्कृति खुश रहना सिखाती है-आचार्य देवेन्द्रसागर

धर्मसभा

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हमारी संस्कृति खुश रहना सिखाती है-आचार्य देवेन्द्रसागर

हमारी संस्कृति खुश रहना सिखाती है-आचार्य देवेन्द्रसागर

बेंगलूरु. आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने ओकलीपुरम से विहार करते हुए गांधीनगर के जगवल्लभ पाश्र्वनाथ जैन मंदिर में पहुंचे। दो दिन की स्थिरता के बाद नगरथपेट की ओर प्रस्थान करेंगे। गांधीनगर जैन संघ में प्रवचन में आचार्य ने कहा कि सच बोलें, किसी का दिल न दुखाएं, दूसरों के प्रति स्नेह की भावना रखें, सभी को समान समझें और विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक सोच बनाए रखें। बहुत सारी संस्कृतियों में हमेशा खुश रहने के लिए कहा जाता है, लेकिन प्रसन्नता को अर्जित नहीं किया जा सकता। यह तो हमारी सोच का अभिन्न हिस्सा है। यह जड़ पकड़े, इसके लिए माता-पिता को अपने बच्चों में सकारात्मक दृष्टिकोण रखने की आदत डालनी चाहिए। जैन मान्यताओं के अनुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करने के लिए जिंदगी का उद्देश्य चार गुणा बढ़ जाता है। धर्म को प्राप्त करने के लिए हमें नेकी और उचित रूप से कार्य करना चाहिए। इसका मतलब हमें हमेशा सैद्धांतिक और नैतिक दृष्टि से सही काम करने चाहिए। अर्थ के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को धन और संपन्नता के लिए काम करना चाहिए। लेकिन इसमें महत्वपूर्ण यह है कि ऐसा करते समय हमें धर्म के सिद्धांतों के अनुरूप ही यह सब करना चाहिए, उसके दायरे के बाहर जाकर नहीं। जैन धर्म का तीसरा उद्देश्य काम है। काम का मतलब है कि हमें जीवन से आनंद प्राप्त करते रहना होता है। चौथा और अंतिम उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना होता है। इसमें ज्ञानोदय प्राप्त करना सबसे मुश्किल होता है। मोक्ष प्राप्त करने के लिए कई बार व्यक्ति के लिए एक जीवन बहुत होता है, तो कई बार उसे कई जन्म लेने होते हैं। मोक्ष ही परम आनंद की स्थिति होती है। उसके बाद न जन्म होता है, न मृत्यु होती है। न किसी से जुड़ाव होता है, न अलगाव। न दर्द होता है न कष्ट। इंसान हमेशा के लिए सभी से मुक्त हो जाता है। उसकी आत्मा, परमात्मा में विलीन हो जाती है या हमेशा के लिए परमात्मा का हिस्सा बन जाती है।