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तप शुद्ध होना चाहिए, जिससे कल्याण हो-आचार्य अरविन्दसागर

श्रेणितप पारणोत्सव का आयोजन

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तप शुद्ध होना चाहिए, जिससे कल्याण हो-आचार्य अरविन्दसागर

तप शुद्ध होना चाहिए, जिससे कल्याण हो-आचार्य अरविन्दसागर

बेंगलूरु. संभवनाथ जैन मंदिर वी.वी.पुरम में आचार्य अरविंदसागर सूरीश्वर की निश्रा में श्रेणितप पारणोत्सव के अंतर्गत तपोवंदना-तपस्वी वधामणा कार्यक्रम महावीर धर्मशाला वी.वी.पुरम बेंगलूरु में आयोजित किया गया। आचार्य चतुर्विध संघ के साथ तपोवंदना कार्यक्रम पंडाल में पहुंचे।
आचार्य अरविंदसागर सूरीश्वर ने कहा कि तप शुद्ध होना चाहिए, जिससे कल्याण हो, निरंतर आत्मरमणता में रहे, सदा प्रभु की अर्चना रह, उनके वचनों को आत्मसात करें। कषायों पर नियंत्रण कर धर्म भावना में अभिवृद्धि करें, ऐसी परिणती के साथ तप ही शुद्ध तप है। इच्छा निरोधक ही तप है। चार संज्ञा में आहार संज्ञा अनादिकाल से जुड़ी है जिसे छोडऩा मुश्किल है। इसलिए प्रभु ने तपधर्म बताया है। परमात्मा की कृपा रहती है तब कहीं जाकर कोई कार्य संभव हो पाता है। सौ तपस्वियों के वधामना का अवसर है। तप सबके जीवन में आए ऐसा सामथ्र्य और मनोबल रहना चाहिए। तपस्वियों के माध्यम से सभी के जीवन में शुभ मंगल अनुमोदना के भावों का संचार हो।

गणिवर्य अमरपद्मसागर ने कहा कि तप एवं तपस्वी मंगल होते हैं। उनके दर्शन से जीवन में मंगल होता है। तप करने वाला आहार संज्ञा का त्याग कर प्रभु की परम कृपा पाता है। तपस्वी की प्रवृति नित्य नियंत्रण में रहते हुए आत्मा एवं काया को पवित्र बनाना है। तप सदा जीवन में उदयीमान होता रहे। राग जो त्याग छे, त्याग नो राग छे, गुरुवरनी पासे एवी मांग छे..ऐसी भावना से गुरु भगवंत को विनती करते हुए तपस्वियों के मन के भाव उल्लसित हुए। जो आदि करवाते हैं ऐसे आदिनाथ दादा और जो असम्भव को संभव कर दे ऐसे संभवनाथ दादा की कृपा से हर तपस्वी यह तप यात्रा पूर्णता की ओर आगे बढ़ रहे हंै। लाभार्थी कोठारी परिवार की ओर से गुरु भगवंत को बधाया। संभव रत्न प्यारो, आदिनाथ प्रभु म्हारो... सभी तपस्वियों का वर्धापन लाभार्थी परिवार द्वारा किया गया। भीष्म श्रेणितप की पूर्णाहुति अंतिम महान मृत्युंजय सहित पूर्ण करने वाली श्राविका वीणा राठौड़ की तप अनुमोदना की गई। 92 वर्ष से लेकर 26 वर्ष की आयु वाले लगभग सौ श्रावक-श्राविकाओं ने श्रेणीतप कर बेंगलूरु के चातुर्मास में एक इतिहास रचा है। कार्यक्रम का संचालन अहमदाबाद के विराजभाई एवं विक्रम गुरु द्वारा किया गया। मुम्बई के हर्षितभाई द्वारा संगीत की स्वरलहरियों वे वातावरण भक्तिमय हो गया।