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तपस्या आत्म शुद्धि का साधन-साध्वी डॉ.सुप्रभा

धर्मसभा का आयोजन

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तपस्या आत्म शुद्धि का साधन-साध्वी डॉ.सुप्रभा

तपस्या आत्म शुद्धि का साधन-साध्वी डॉ.सुप्रभा

बेंगलूरु. जय ब्रज मधुकर अर्चना चातुर्मास समिति के तत्वावधान में साध्वी डॉ. सुप्रभा ने कहा कि ऋषि-मुनियों ने भी उपवास, लंघन को सबसे बड़ी औषधि बताया है। उपवास की साधना करने से साधक मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहकर कई प्रकार के आध्यात्मिक लाभ को प्राप्त करता हुआ अपने कर्मों की निर्जरा करता है। उन्होंने महावीर के बताए 12 प्रकार के तपों में से छह प्रकार के बाहरी और छह प्रकार के अभ्यंतर तप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पहले के 6 बाहरी तप पहले सीधे शरीर पर असर करते हैं फिर आत्मा पर असर करते हैं। लेकिन छह अभ्यंतर तप सीधे आत्मा पर असर करते हैं। उन्होंने सभी तपस्या करने वाले भाई बहनों की तपस्या की अनुमोदना करते हुए कहा कि तपस्या आत्म शुद्धि का साधन है। तप करने से कर्मों की निर्जरा होती है। साध्वी डॉ. उदितप्रभा ने कहा कि जीवन का सच्चा सुख त्याग में है। उन्होंने भौतिकवाद और अध्यात्मवाद पर कहा कि जो पूर्ण रूप से खुला हुआ है उसे पदार्थवाद कहते हैं और जो ढका हुआ है, जिसके ऊपर आवरण है उसे अध्यात्मवाद कहते हैं। उन्होंने तपस्या करने वालों को शूरवीर बताते हुए कहा कि तपस्या करना साधारण लोगों के बस की बात नहीं है। आत्मबल के धनी ही तब साधना कर सकते हैं। तपस्या करने से आत्मा पवित्र निर्मल शुद्ध बनती है और साधक के अपार कर्मों की निर्जरा होती है। इस अवसर पर धर्मसभा में सुनील बाफना ने 31 उपवास के पच्चक्खान साध्वीवृंद से ग्रहण किए। मासखमण करने वाले तपस्वी का समिति की ओर से अध्यक्ष पुखराज बोथरा, उपाध्यक्ष प्रकाशचंद बेताला, संयोजक धर्मेंद्र मरलेचा, महामंत्री मनोहरलाल लुकड़ कोषाध्यक्ष गुलाबचंद पगारिया युवा अध्यक्ष महावीर चोरडिय़ा ने अभिनंदन साफा, शॉल, माला, एवं स्मृतिचिन्ह से किया। इस अवसर पर अनेक भाई-बहनों ने धर्मसभा में साध्वी से 7-८ एवं 11 उपवास और आगे की तपस्या के पचक्खान ग्रहण किए। सभी तपस्वियों का भी चातुर्मास समिति की ओर से अभिनंदन किया गया। कार्यक्रम का संचालन जय ब्रज मधुकर अर्चना चातुर्मास समिति के महामंत्री मनोहरलाल लुकड़ ने किया।