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वैश्विक नेतृत्व के लिए ‘स्वस्थ भारत-सशक्त भारत’ का मंत्र जरूरी: राज्यपाल गहलोत

भारत की चिकित्सा परंपरा हजारों साल पुरानी है। चरक, सुश्रुत और धन्वंतरि जैसे महान ऋषियों ने आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टिकोणों से चिकित्सा को देखा।

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राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने कहा कि स्वस्थ नागरिक ही एक मजबूत और स्वस्थ राष्ट्र की नींव होते हैं। अगर हम देश को आत्मनिर्भर, नवोन्मेषी और वैश्विक नेतृत्व में अग्रणी बनाना चाहते हैं तो हमें 'स्वस्थ भारत-सशक्त भारत' का मंत्र अपनाना होगा।वे आरोग्य संकल्प के तहत विश्व हिंदू परिषद की ओर से रविवार को आयोजित चिकित्सक सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा, भारत की चिकित्सा परंपरा हजारों साल पुरानी है। चरक, सुश्रुत और धन्वंतरि जैसे महान ऋषियों ने आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टिकोणों से चिकित्सा को देखा। आज हमारे पास आयुर्वेद, योग, सिद्ध, यूनानी, होम्योपैथी और एलोपैथी जैसी बहुआयामी प्रणालियां हैं, जो मिलकर समग्र स्वास्थ्य सेवा की अवधारणा को मूर्त रूप देती हैं।हमें चिकित्सा प्रौद्योगिकी, जीपीएस आधारित डायग्नोस्टिक्स, टेलीमेडिसिन, इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड और एचएसबीसी के क्षेत्र में आगे बढऩे की जरूरत है। चिकित्सा अनुसंधान में नवाचार होना चाहिए। चिकित्सकों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचना चाहिए। आज के दौर में जहां वैश्विक स्वास्थ्य संकट, जीवनशैली संबंधी बीमारियों और मानसिक तनाव ने समाज को परेशान कर रखा है, वहीं आरोग्य संकल्प आशा की किरण बनकर उभर रहा है।

उन्होंने कहा कि आरोग्य संकल्प एलोपैथी, आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और होम्योपैथी को एकीकृत करके समाधान प्रदान करने का एक सकारात्मक प्रयास है।आयुर्वेद और होम्योपैथी को अभी भी वैकल्पिक चिकित्सा के रूप में देखा जाता है। ये हमारी प्राचीन विरासत हैं, जिन्हें आधुनिक शोध के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता है।

राज्यपाल गहलोत ने स्वास्थ्य सेवाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचें और चिकित्सकों की शिक्षा और प्रशिक्षण में गुणवत्ता और संवेदना को शामिल करने पर जोर दिया।उन्होंने कहा कि 2047 में हम आजादी के 100 साल मनाएंगे, तब हमारा भारत एक स्वस्थ भारत, एक आत्मनिर्भर भारत और एक समृद्ध भारत होना चाहिए। इसमें सभी की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।