
बेंगलूरु. बचपन से ही नृत्य की ओर आकर्षण रहा। इसी आकर्षण की वजह से वे एक नृत्यांगना व बाद में एक नृत्य शिक्षिका बन गईं। इंदौर, भोपाल, देवास एवं बेंगलूरु में कई शैक्षणिक संस्थानों और अपनी खुद की संस्था में अनेक छात्र-छात्राओं को विभिन्न शैलियों में नृत्य सिखा चुकी कथक नृत्य गुरु आरती परमार का मानना है कि कथक एवं भारत की अन्य शास्त्रीय नृत्य शैलियां मात्र हमारी राष्ट्रीय धरोहर ही नहीं, बल्कि एक तरह की साधना हैं, जो आपके मस्तिष्क को शांत करती हैं, शरीर को व्यायाम देती हैं। इसे सीखने से तन तंदुरुस्त, मन शांत और मस्तिष्क ध्यानमग्न होता है।
वे कहती हैं, कथक शब्द की उत्पत्ति कथा शब्द से हुई है। नृत्य के माध्यम से जब अपने हावभाव का उपयोग कर किसी कथा को दर्शकों के सामने पेश किया जाता है तो उसे कथक कहते हैं। भारत की सभी शास्त्रीय नृत्य शैलियों में भाव की अनूठी सुंदरता होती है, जिसमें कथक अपने अनुशासन और तत्कारों के लिए प्रसिद्ध है। मुंह से बोले गए शब्द पैरों से भी तत्कार के माध्यम से निकाले जाते हैं, ये कथक की विशेषता है।
Published on:
08 Mar 2024 01:55 pm
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