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विनय और विवेक ही धर्म का मूल : ज्ञानमुनि

अक्कीपेट स्थित वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ स्थानक में चातुर्मास प्रवचन में ज्ञानमुनि ने कहा कि विनय और विवेक ही धर्म का मूल है। विनय और विवेक में ही सभी गुण समाए हुए हैं।

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विनय और विवेक ही धर्म का मूल : ज्ञानमुनि

विनय और विवेक ही धर्म का मूल : ज्ञानमुनि

बेंगलूरु. अक्कीपेट स्थित वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ स्थानक में चातुर्मास प्रवचन में ज्ञानमुनि ने कहा कि विनय और विवेक ही धर्म का मूल है। विनय और विवेक में ही सभी गुण समाए हुए हैं।

साधक को हर पल विवेक से रहना चाहिए। वह जो भी कार्य करता है उसे पूर्ण विवेक के साथ ही करना चाहिए। बिना विवेक से किया हुआ कार्य कर्मों की निर्जरा नहीं करता, अपितु और अधिक कर्मों का बंधन करता है।
विनम्रता से ही जीवन में अनेक गुण विकसित होते हैं। इस जन्म में हम सभी को मनुष्य शरीर मिला है, उसका हमें सदुपयोग करके धर्म साधना में लगाना चाहिए।

पल पल हमारी उम्र घटती जा रही है। उन्होंने आचार्य आनंदऋषि के गुणों को स्मरण करते हुए कहा कि आचार्य कई बार कहा करते थे कि हम मोह रुपी नींद में सो रहे हैं। जो बीत गया है उसे भूलकर हमें आगे के बारे में सोचकर सकारात्मक रूप से पुरुषार्थ करना चाहिए। प्रारम्भ में लोकेशमुनि ने विचार व्यक्त किए। साध्वी पुनीतज्योतिश्री की मंगलमय उपस्थिति रही। अध्यक्ष सम्पतराज बडेरा ने स्वागत किया। संचालन विनोद भुरट ने किया।

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