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बांसवाड़ा : प्लास्टिक और धातू के आगे उजड़ता बांस का वैभवशाली संसार, कद्रदान घटे तो हुनर भी सिमटा

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बांसवाड़ा : प्लास्टिक और धातू के आगे उजड़ता बांस का वैभवशाली संसार, कद्रदान घटे तो हुनर भी सिमटा

आशीष बाजपेई. बांसवाड़ा. बांस तराशो तो सज-बस जाता है घर संसार। हुनरमंदों के लिए बांस रोटी-रोजी का साधन है पर औरों के लिए इसके उत्पाद घरेलू सामग्री को समुचित तरीके से रखने और सहेजने व ड्राइंग रूम को सजाने संवारने की वस्तु है।नए जमाने की चकाचौंध में बांस के उत्पादों के कद्रदान भी घट गए हैं और इससे बांस को चीर-छीलकर उसे अलग अलग रूपों में ढालने में माहिर हनुरमंद लोग भी कम होते जा रहे हैं। बांस से जुडी सामग्री तैयार करने का काम बांसफोड़ समाज परंपरागत रूप से करता आ रहा है, लेकिन कई अन्य वर्ग के लोग भी इससे जुड़े। मांग के अलावा बांस की उपलब्धता की कमी के बीच प्लास्टिक और धातु की वस्तुओं का बोलबाला ऐसा हुआ कि वह बांस के वैभव को लील रहा है। रोजमर्रा के जीवन में उपयोगी बांस की सामग्री से लोग दूर हो रहे हैं।

एक बार देख कुछ भी बनाने का हुनर
समाज के प्रकाश ने बताया कि कई लोगों में ऐसा हुनर है कि यदि वो बांस का कोई सामान एक बार देख ले उसके बाद हूबहू सामान बना देते हैं। ऐसा इसलिए भी है कि समाज के लोगों में यह हुनर पुश्तैनी सौगात के रूप में मिला है।

कई सामान तो आंख बंद कर बना लेता हूं
बांसफोड़ समाज के बुजुर्ग 62 साल के शंकर भीलूडिय़ा बांस को चीर पतली पट्टियों को बुन तरह-तरह के उत्पाद बनाने में ऐसे माहिर कि कई उत्पाद तो आंख बंदकर ही तैयार कर दें। उन्होंने बताया कि जब से होश संभाला तभी से घर में बांस को तरह-तरह के रूप लेते देखा। पिता और घर के अन्य बुजुर्गों को देखते-देखते कब खुद हुनर सीख लिया पता ही नहीं चला। 45 से 50 वर्ष हो गए इस काम को करते-करते।

पहले तो तरह-तरह के सामान बनाता रहता था, लेकिन अब कुछ सामान ही बनाने को मिलते हैं क्योंकि लोग अब कई सामानों की डिमांड ही नहीं करते। इसलिए हम बनाकर भी क्या करें।बुजुुर्ग शंकर ने बताया कि पहले घरों में अनाज रखने के लिए बांस की कोठियां बनाई जाती थी। जो कम कीमत पर भी बन जाती थीं और सालों साल चलती थीं। इसके अलावा भी कई सामान मसलन सूतिया, बांस की झोंपड़ी सहित ढेरों ऐसे उत्पाद थे जो अब बिल्कुल ही बनना बंद हो गए हैं।

नई पीढ़ी का रुझान नहीं
शिवलाल बताते हैं कि जिले में उनके समाज के तकरीबन 500 परिवार होंगे, लेकिन युवा पीढ़ी इस हुनर को सीखने से कतराती है, क्योंकि अब बांस के उत्पादों की कम मांग रह गई है। जिससे घर चलाना भी कठिन हो जाता है। समाज में शिक्षा का स्तर भी ज्यादा होने के कारण इस धंधे से लोग मुंह मोड़ रहे हैं। अन्य समाज के कई लोग भी बांस से उत्पाद बनाते थे। उन्हें भी यही समस्या आ रही है।


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