बांसवाड़ा

चुनाव में कदमताल, पर बांसवाड़ा में नहीं गलती निर्दलीय की दाल

बांसवाड़ा. चुनाव आते ही राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता टिकट की दौड़ में सम्मिलित होते हैं। कई बार टिकट नहीं मिलने पर बगावती तेवर दिखाते हुए चुनाव मैदान में निर्दलीय भी खड़े हो जाते हैं, किंतु बांसवाड़ा में मतदाताओं को निर्दलीय प्रत्याशी रास नहीं आते हैं। बीते चार चुनाव के आंकड़ों को देखें तो मात्र दो निर्दलीय ही सदन में पहुंचे, जिन्होंने सत्तारूढ़ दल को समर्थन दिया।

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राजस्थान विधानसभा चुनाव

बांसवाड़ा. चुनाव आते ही राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता टिकट की दौड़ में सम्मिलित होते हैं। कई बार टिकट नहीं मिलने पर बगावती तेवर दिखाते हुए चुनाव मैदान में निर्दलीय भी खड़े हो जाते हैं, किंतु बांसवाड़ा में मतदाताओं को निर्दलीय प्रत्याशी रास नहीं आते हैं। बीते चार चुनाव के आंकड़ों को देखें तो मात्र दो निर्दलीय ही सदन में पहुंचे, जिन्होंने सत्तारूढ़ दल को समर्थन दिया।

चुनाव में कई प्रत्याशी ऐसे भी होते हैं, जो निर्दलीय चुनाव लड़कर अपना चुनावी भाग्य आजमाते हैं। कई सफल होते हैं तो कइयों को हार झेलनी पड़ती है। राजनीतिक दल को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में सरकार के गठन में महत्वपूर्ण दारोमदार निर्दलीय पर होता है। निर्दलीय के समर्थन पर सदन में बहुमत साबित कर पाने पर ही सरकार बन पाती है।

पहले निर्दलीय बने संसदीय सचिव
बांसवाड़ा जिले के चुनावी इतिहास को खंगालें तो अब तक मात्र दो ही निर्दलीय ही जीत का ताज पहन पाए हैं। इसमें एक पुरुष व एक महिला प्रत्याशी हैं। 2003 के चुनाव में घाटोल सीट से कांग्रेस ने नानालाल निनामा को टिकट दिया। वे चुनाव जीते और सदन में पहुंचे। पांच साल बाद उन्होंने इसी सीट से दोबारा टिकट मांगी, किंतु कांग्रेस ने अन्य कार्यकर्ता को मौका दिया। इस पर नानालाल ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला तो नानालाल सहित अन्य निर्दलीय के समर्थन से कांग्रेस की सरकार बनी। इस पर निनामा को संसदीय सचिव बनाकर राज्यमंत्री को तोहफा भी दिया।

दस साल बाद महिला
जिले में 2008 के बाद 2018 के चुनाव में कुशलगढ़ सीट से निर्दलीय रमीला खडि़या ने चुनाव जीता। कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर वे चुनाव मैदान में खड़ी हुई। पूर्व में प्रधान रहे उनके पति हुरतींग खडि़या के निधन के कारण मतदाताओं की सहानुभूति का लाभ मिला और वे जिले से पहली महिला निर्दलीय विधायक चुनी गईं। खडि़या ने भी राज्य सरकार को समर्थन किया। यह संयोग ही रहा कि बांसवाड़ा से दो निर्दलीय अलग-अलग वर्षों में जीते और उन्हीं वर्षों में प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनी।

चार बार जीते, निर्दलीय लड़े तो जमानत गंवाई
घाटोल विधानसभा सीट से भाजपा के नवनीतलाल निनामा ने चार बार जीत दर्ज की, किंतु गत चुनाव में टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा तो 3 हजार 899 वोट मिले और जमानत गंवानी पड़ी। गत चुनाव में जिले की पांच सीटों से कुल 10 प्रत्याशी निर्दलीय चुनाव लड़े, जिसमें बांसवाड़ा से धनसिंह रावत ने सबसे अधिक वोट प्राप्त किए थे।

इन्हें सबसे कम वोट

निर्दलीय के प्रति मतदाताओं की उदासीनता का प्रमाण 1990 में ही सामने आ गया था, जब कुशलगढ़ सीट से निर्दलीय विजयसिंह को मात्र 42 वोट से ही संतोष करना पड़ा था। एक अन्य निर्दलीय कानजी को 54 वोट मिले। 1998 में कुशलगढ़ से ही वरसिंह को 80 वोट मिले।
इन्हें सर्वाधिक मिले मत

जिले में कुशलगढ़ से रमीला खडि़या को 2018 में सबसे अधिक 94344 तथा 2008 में घाटोल से नानालाल को 53 हजार 262 वोट मिले थे। दोनों विधायक चुने गए। वहीं 2018 में बांसवाड़ा से धनसिंह रावत को 32 हजार 950 वोट मिले।

Published on:
17 Oct 2023 12:53 pm
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