
Success Story : बांसवाड़ा जिले के पढ़े-लिखे युवाओं को खेती-किसानी रास आ रही है। वे उच्च शिक्षा के बाद नौकरी के सपने नहीं बुनते। इसकी जगह किसान बनकर खुशहाल जीवन जी रहे हैं। गणाऊ गांव में आदिवासी समाज के 12 युवा इस बदलाव की नजीर पेश कर रहे हैं। ये पढ़े-लिखे युवा आधुनिक तकनीक का सहारा लेकर कृषि के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। इनमें कुछ युवा पढ़ाई भी जारी रखे हुए हैं। कुछ पूरी तरह खेती पर निर्भर होकर प्रतिमाह 40 से 50 हजार रुपए तक कमा रहे हैं। पढ़िए ऐसे ही दो युवाओं की कहानी...
स्नातक और प्रोफेशनल डिग्री ले चुके इन युवाओं का मानना है कि वे परंपरागत खेती मसलन गेहूं, मक्का का उत्पादन घर के उपयोग के लिए ही करते हैं। उनका पूरा फोकस कैश क्रॉप यानी सब्जियों आदि पर रहता है। इससे उनकी आमदनी नियमित होती रहती है और नुकसान की संभावना नगण्य रहती है। ये युवा जैविक खेती पर भी विशेष ध्यान दे रहे हैं।
गणाऊ गांव के ही दिनेश चरपोटा ने जीएनएम व लैब असिस्टेंट का कोर्स किया। परिवार वाले चाहते थे कि दिनेश नौकरी करे, लेकिन दिनेश को खेतों से प्यार था। करीब पांच वर्ष पूर्व वे किसान बन गए। तब से सब्जियों और फूलों की खेती कर रहे हैं। आज दिनेश की पहचान एक सफल किसान के रूप में है। वे खेती-बाड़ी की बदौलत खुशहाल जीवन जी रहे हैं। दिनेश बताते हैं कि आधुनिक तकनीक से खेती की जाए, तो अच्छे रिजल्ट आते हैं। फायदों को देखकर ही उन्होंने खेत का रुख किया। उनका मानना है कि गांव के युवा यदि खेती करें और जानकारी जुटाकर आगे बढ़े तो अपना जीवन बेहतर बना सकते हैं।
गणाऊ गांव के सुखराम चरपोटा ने बीए-बीएड किया है। सुखराम के पिता और भाई ने सरकारी नौकरी की। वे चाहते थे कि सुखराम सरकारी शिक्षक बने, लेकिन सुखराम ने खेती को चुना और आज खुशहाल जीवन गुजार रहे हैं। वे खेती की आधुनिक तकनीक अपनाते हैं। पिछले करीब 10 वर्ष से सब्जियों और फूलों की पैदावार कर रहे हैं। सुखराम का मानना है कि खेती करने में मेहनत तो होती है, लेकिन इससे शारीरिक और आर्थिक मजबूती मिलती है। रोजाना तड़के चार बजे से उनकी दिनचर्या शुरू हो जाती है। रात को समय पर सो जाते हैं। दिनभर खेत पर मेहनत करते हैं। वे कब बीमार पड़े, उन्हें ध्यान नहीं है।
Published on:
04 Apr 2024 03:54 pm
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