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राजस्थान का रण : बांसवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में रेल नहीं, रोडवेज अधमरी, जोखिम भरा सफर करना आदिवासियों की मजबूरी

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राजस्थान का रण : बांसवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में रेल नहीं, रोडवेज अधमरी, जोखिम भरा सफर करना आदिवासियों की मजबूरी

मृदुल पुरोहित. बांसवाड़ा. माही बांध पास में है, लेकिन खेतों की प्यास नहीं बुझती। खेती-बाड़ी बरसात के भरोसे है। बैकवाटर के आसपास बसे कई ऐसे गांव हैं, जहां खेती योग्य जमीन पानी के अभाव में सूखी पड़ी है। माही डेम से बांसवाड़ा के सरसब्ज होने की बात सिर्फ सिंचित इलाकों में है। हमारे दर्द को समझने की कभी कोशिश नहीं की गई। यह व्यथा है बांसवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में आने वाले दानपुर के किसान शांतिलाल , नापला के विनोद और कांतिलाल की। उनका कहना है कि माही के बैकवाटर के किनारे बसे गांवों के अधिकांश लोग रबी की फसल की सिंचाई के लिए पानी नहीं मिलने पर मन मसोस कर रह जाते हैं। बांसवाड़ा शहर सहित मध्यप्रदेश की सीमा को छूते ग्रामीण विकास और पंचायतीराज राज्यमंत्री धनसिंह रावत के विधानसभा क्षेत्र बांसवाड़ा की पड़ताल के लिए दानपुर रवाना हुआ तो रास्ते में नापला के अटल सेवा केंद्र के बाहर विनोद और कांतिलाल से बात हुई। बोले ‘शहर तक आने-जाने में वाहनों की कोई दिक्तत नहीं है। हाईवे की सडक़ भी अच्छी है, लेकिन बिजली-पानी और सिंचाई की समस्या है। माही नदी पास में है, लेकिन खेतों की प्यास नहीं बुझती है। हमारी हालत जल बीच प्यासी मछली जैसी है।’ दानपुर पहुंंचने पर एक निर्माण कार्य पर लगे मजदूर शांतिलाल ने भी अपने मन की पीड़ा बयां की। उसने नेताओं को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि वो वोट लेने आते हैं, इसके बाद भूल जाते हैं।

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पाड़ला पुलिस चौकी तक हाइवे की सडक़ से आंबापुरा जाने वाली राह पकड़ी तो करीब दस-बारह किलोमीटर तक खस्ताहाल और पेचवर्क के पैबंद वाली सडक़ से होते हुए आमलीपाड़ा, बोरतलाब गांवों से होकर देवगढ़ पहुंचा। परचून व्यापारी गणेश कुमार से चर्चा की तो उल्टे सवाल किया कि समस्याओं का कभी अंत होता है? सडक़ हो या बिजली-पानी, गांवों में यही तो चाहिए, लेकिन कभी राहत नहीं मिलती। करीब दो-तीन किमी दूर बदरेल पहुंचा तो यहां सडक़ किनारे एक झुग्गी में छोटी सी दुकान लगाने वाले कालूभाई से बात हुई। बोले ‘चार बेटे हैं। एक ने खुद का मकान बनाया है, लेकिन उन्हें आवास योजना का लाभ नहीं मिला। फार्म भरा था, लेकिन अब तक सूची में नाम नहीं आया है। तीन बेटे और परिवार कच्ची झोंपड़ी में ही रहते हैं। थोड़ी खेती-बाड़ी की जमीन है। उसी से घर चलता है।’ समस्या के बारे में पूछा तो कहा कि ‘अस्पताल, स्कूल की व्यवस्था तो ठीक है, लेकिन पानी के लिए हैंडपंप पर निर्भर हैं। गर्मी में पानी नीचे चला जाता है तो एक-डेढ़ किमी दूर से लाना पड़ता है। अस्पताल वाले भी पानी नहीं लेने देते, जबकि वहां बोरवेल बना हुआ है।’ बदरेल से दो-तीन किमी दूर ही आंबापुरा गांव है, जहां तहसील, पुलिस थाना, उच्च माध्यमिक विद्यालय जैसी सुविधाएं तो हैं लेकिन आवागमन के साधनों का नितांत अभाव है।

बांसवाड़ा से रोजाना आने वाले व्यापारी ने कहा कि ‘शाम को रोजाना एक रोडवेज बस चलती है, जो बांसवाड़ा से आंबापुरा-खेड़ा से होते कुशलगढ़ और आगे जाती है। आने-जाने के लिए निजी बसें और जीप हैं जो सवारियों की भीड़ भरकर चलती हैं। और कोई वैकल्पिक साधन भी नहीं हंै। ऐसे में इन्हीं निजी बसों व जीपों में सफर की मजबूरी है।’ आंबापुरा बस स्टैंड पर अपने गांव कलियारी खोरापाड़ा जाने के लिए जीप का इंतजार कर रहे करमा ने कहा कि गांव में सडक़ नहीं है। आधी जगह बिजली है तो आधे हिस्से में अब भी इंतजार है। गांव में खेतीबाड़ी के बारे में पूछा तो चेहरे पर दर्द छलक आया। बोला कि मक्का की फसल (खरीफ सीजन) तो बारिश से हो जाती है, लेकिन गेहूं के लिए वाटर पंप पर निर्भर हैं। जिनके पास वाटर पंप जैसी सुविधा नहीं है, उनके खेत सूखे रहते हैं। उसके पास ही खड़े झरनिया खोरा के बहादुर ने कहा कि झरनिया गांव में बिजली है, लेकिन आसपास की बिखरी बस्ती में अंधेरा पसरा है। रात्रि में टॉर्च से आवागमन करते हैं। पेयजल के लिए हैंडपंप ही आसरा है।

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आंबापुरा में ही राशन डीलर के यहां खाद्यान्न लेने के लिए आसपास के ग्रामीण एकत्र थे। महिलाएं भी अपनी बारी का इंतजार कर रही थी। पूछने पर बड़ाडूंगरा के वालु ने कहा कि उनके यहां लिफ्ट तो हैं, फिर भी सिंचाई को लेकर समस्या होती है। बिजली के पोल लगाए हैं, घरेलू कनेक्शन का इंतजार है। यहां गामदा के बुजुर्ग लवजी भाई से चर्चा हुई तो स्थिति कमोबेश अन्य लोगों की बयानी जैसी ही सामने आई। सरकार से मिले लाभ के बारे में पूछा तो कहा कि न तो आवास मिला, न शौचालय और न ही उज्ज्वला का कनेक्शन। राज्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र में बांसवाड़ा शहर भी शामिल हैं। शहर के विभिन्न वार्डों में लोगों से बातचीत की तो समस्याओं का ढेर खड़ा कर दिया। भवानपुरा के लक्ष्मणलाल हों या तिरूपति नगर के मनोज कुमार, हाउसिंग बोर्ड के ललित, आंबावाड़ी की सलमा या नबीपुरा-भीमपुरा क्षेत्र की फरजाना, सभी ने नगर परिषद को आड़े हाथ लिया। कहीं नियमित सफाई नहीं तो कहीं उबड़-खाबड़ और क्षतिग्रस्त सडक़ों से होने वाली परेशानी की पूरी कहानी ही सुना डाली। लोगों ने नगर परिषद की कार्यशैली पर सवाल कर कहा कि ‘सब सामने हैं। आप भी शहर के हो, क्या छिपा हुआ है।’


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