
डाक दिवस : भारत में है दुनिया का सबसे बड़ा डाक पोस्टल नेटवर्क, इंटरनेट की चुनौतियों के बावजूद बना रखा है अपना वजूद
दीनदयाल शर्मा/बांसवाड़ा. कहते हैं तो पानी के प्रवाह की तरह आगे बढ़ते हैं वे अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं और नई मंजिले भी पाते हैं, लेकिन जो ठहर जाते हैं उनका अस्तित्व अधर में पड़ जाता है। दुनिया के सबसे बड़े पोस्टल नेटवर्क पर यह बात खूब लागू हो रही है। कंप्यूटर, सूचना प्रौद्योगिकी और संचार क्रांति के मौजूदा युग में जितनी चुनौतियां डाक सेवा के सामने आई वैसी शायद ही किसी और क्षेत्र में आई हो, लेकिन वक्त के थपेड़ों का डाक विभाग ने अपने कर्म से रुख पलट दिया। जिस पोस्टकार्ड, लिफाफे और अंतरदेशीय पत्र से विभाग की खास पहचान थी वे भले ही इंटरनेट और मोबाइल की नई दुनिया की चकाचौंध में गुम हो गए, लेकिन इस नई दुनिया से कदमताल कर डाक सेवा ने न केवल अपना वजूद कायम रखा बल्कि नए सोपान हासिल कर सफलता का परचम लहराया है। सीमित सेवाओं के दायरे से निकलकर वह कार्यो के व्यापक जाल का मालिक है और गर्व से अपना सिर ऊंचा रखे हुए है। डाक दिवस के मौके पर बांसवाड़ा को ही लें, तो ं डाक विभाग के विकास की कहानी अपने आप में अनूठी है। बुजुर्ग बताते हैं कि इस आदिवासी बहुल इलाके में सन 1927 में शहर के सदर बाजार में छोटे से डाकघर के साथ डाक सेवां की शुरुआत हुई। अब उस पुराने डाकघर का अस्तित्व ही नहीं है, लेकिन पचास साल बाद सन् 77 में नया मुख्य डाकघर बना और उसके बाद डाक सेवाओं के विस्तार में तेजी आई। आज शहर में चार, उपखंड-तहसील मुख्यालयों समेत बड़े कस्बों में 18 और गांवों में डाक विभाग के छोटे कार्यालय 252 हैं।
इसलिए बांसवाड़ा में प्रासंगिक है डाक सेवा : -
राजशाही के समय हरकारे से गांव-गांव में संदेश की व्यवस्था और फिर गली-मोहल्ले में डाकिए की साइकिल से घंटी की ट्रीन-ट्रीन लोगों को उत्सुकता से दौड़ाती थी। मौखिक संदेश के बाद चिठ्ठियां ही थीं, जिसका हर किसी को बेसब्री से इंतजार रहता था। अब मोबाइल मैसेज ने डाक विभाग की प्रथम श्रेणी की सेवाएं पोस्ट कार्ड, अंतरदेशीय पत्र और लिफाफे के इस्तेमाल को भले ही नगण्य कर दिया, लेकिन मरण-मौत पर चीरी भेजने के लिए आज भी सबसे सस्ता और सुलभ साधन पोस्टकार्ड ही है। इसके अलावा दूरदराज के गांवों में जहां मोबाइल का नेटवर्क अब भी मुश्किल ही है, वहां डाक विभाग की द्वितीय श्रेणी की सेवाएं पत्र-पत्रिकाएं, बुक पोस्ट, किताबें आदि निजी कुरियर सर्विस की बाढ़ के बावजूद भी अपनी प्रासंगिता बनाए हुए हैं।
अब सेवाओं का नया कलेवर, कुछ कमजोरियां भी : - मौजूदा दौर में डाक विभाग बांसवाड़ा इंडियन पोस्ट पेमेंट सिस्टम के जरिए खाता देशभर में कहीं भी हो, घर बैठे बैंकिंग सुविधा देने के साथ स्पीड पोस्ट, इंसटेंट मनीऑर्डर, मीडिया पोस्ट, बिजनेस पोस्ट, पासपोर्ट सेवा, आधार कार्ड बनाने समेत परिवहन विभाग से ड्र्राइविंग लाइसेंस जारी करने की व्यवस्था में बुकिंग, डिलेवरी की सेवाएं कर रहा है। वर्षों तक मेन्युअल कामकाज के बाद बीते पांच सालों में विभाग ने ऑनलाइन नेटवर्क सीबीएस यानी कोर बैंकिंग सोल्यूशन को अपनाया, जिससे वह निजी क्षेत्र को चुनौती दे रहा है। यह बात और है, स्टाफ की लगातार कमी से जद्दोजहद बढ़ती जा रही है। वर्तमान में मुख्य डाकघर में कुल 26 स्वीकृत पदों के मुकाबले पर्यवेक्षकीय और अधीनस्थ स्टाफ के 5 पद ही भरे हुए हैं और बीस फीसदी स्टाफ जैसे-तैसे सेवाएं दे रहा है।
एक सच यह भी : गांवों-कस्बों में अब लाल डिब्बे शो-पीसपरतापुर. मोबाइल, नेट के दौर में पत्र लेखन नगण्य होने से डाक विभाग के लाल डिब्बे भी शो-पीस बन गए हैं। इन्हें डाकिए खोलते तो नियमित हैं, लेकिन चि_ियां बहुत कम होती है, जिन्हें डिलीवर करने में विभागीय अमला लगता है। परतापुर नगर को ही लें, तो यहां लोगों की सुविधा के लिए डाकघर के बाहर, बोहरावाड़ी, चार खंबा एवं लक्ष्मीनारायण मंदिर के पास लेटर बॉक्स लगाए, लेकिन ये अक्सर खाली रहने लगे और अब यहां एक-दो जगह ही डिब्बे दिखाई देते हैं। डाकघर के बाहर लगे लेटर बॉक्स में भी कभी कभार सरकारी डाक एवं कार्ड मिलते हैं। हालांकि स्पीड पोस्ट, बैंक डाक बढ़ी है। डाकिए बताते हैं कि पहले लेटर बॉक्स चिठ्ठियों से भरे रहते थो डाक बांटते-बांटते पूरा दिन गुजर जाता था। अच्छे समाचार पर लोगों की खुशी में शरीक हो जाते, तो बुरे समाचारों पर ढांढस भी बंधाते। कई बार लोगों को सही पता लिखकर उनकी मदद भी करते। अब सब खत्म होने को है।
कुछ रोचक तथ्य : - 9 अक्टूबर 1874 को विश्व का यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन स्विटजरलैण्ड में बना, जिसमें 22 देशों ने एक संधि पर दस्तखत किए। वही दिन विश्व डाक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।वर्ष 1766 यानी 252 साल पहले भारत में शुरू हुई थी डाक व्यवस्था।1774 में कोलकाता में पहला डाकघर स्थापित किया था वारेन हेस्टिंग्स ने।1852 में भारत में पहली बार चि_ी पर डाक टिकट लगाने की शुरुआत।1 अक्टूबर, 1854 को भारत में एक विभाग के तौर पर डाक विभाग की स्थापना हुई थी।1 जुलाई, 1876 को भारत यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बना।1972 में पिन कोड सिस्टम लागू हुआ भारत में।1.55 लाख से अधिक पोस्ट ऑफिस हैं भारत में। इनमें 89.87 फीसद पोस्ट ऑफिस ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।
इनका कहना है...वागड़ में डाक विभाग की सेवाओं का विस्तर वर्षों के प्रयासों से मुमकिन हुआ है। अब इसे बेहतर बनाने में जुटे हैं।।एनएल कुम्हार अधीक्षक डाक डूंगरपुर-बांसवाड़ा मंडल
Published on:
10 Oct 2019 01:43 pm
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