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यहां कड़ाके की सर्दी में सरेराह बिकता है ‘बर्फ खान गोला’

बर्फ खान गोला यह नाम सुनकर चौंकिए नहीं, क्योंकि बर्फ खान गोला बर्फ से बनी आइस्क्रीम नहीं बल्कि अमरूद की एक किस्म है।
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बारां

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Santosh Trivedi

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Updated: 25 Nov 2022, 12:06 PM IST

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विजय बत्रा/बारां/अन्ता. बर्फ खान गोला यह नाम सुनकर चौंकिए नहीं, क्योंकि बर्फ खान गोला बर्फ से बनी आइस्क्रीम नहीं बल्कि अमरूद की एक किस्म है। जिसके दीवाने कोटा- बारां मार्ग नेशनल हाई-वे 27 पर पलायथा क्षेत्र में रुक इसका स्वाद चखना नहीं भूलते। पलायथा, चींसा एवं गुलाबपुरा गांव में अमरूद के लगभग दो दर्जन बगीचे हैं। जिनमें उपरोक्त किस्म के अलावा लखनऊ-49 एवं इलाहाबादी सफेदा किस्म के अमरूदों की पैदावार होती है। पैदावार करने वाले लोग अमरूदों को कोटा एवं बारां की मंडी में भेजने के अलावा बगीचे के सामने ही ठेले लगा फुटकर रूप से बेचते भी हैं।

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इनमें नमक मिर्च का मसाला लगाने से इनका स्वाद ओर बढ़ जाता है। इसी कारण हाइवे से गुजरती कई चमचमाती कारें एवं दुपहिया वाहन चालक मीठे एवं रसभरे अमरूदों को देख यहां रूकने का लोभ नहीं त्याग पाते। अमरूद के बाग मालिक बगीचे को हर साल उत्पादन एवं किस्म के अनुरूप 10 से 50 हजार रुपए बीघा की दर से किराए पर दे देते हैं। जिसके बाद किराए पर लेने वाले लोग सपरिवार साल भर यहीं रह अपनी आजीविका चलाते हैं।

लगा जड़ गलन रोग
जैविक खेती के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित गुलाबपुरा के किसान गणपत लाल नागर के अनुसार अमरूद की नई किस्म बर्फ खान गोला को काफी दिन तक स्टोर किया जा सकता है। जबकि लखनऊ-49 किस्म ज्यादा दिन भंडारण नहीं की जा सकती। अमरूद का बगीचा लगभग 25 साल बारहों महीने फल देता है। विशेषकर सर्दी में भरपूर अमरूद आते हैं।

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इन बगीचों से क्षेत्र के लगभग 150 जनों को रोजगार मिला हुआ है। लेकिन पिछले 5-6 साल से अमरूद बगीचों में जड़ गलन रोग लग जाने से कई पेड़ों की डालियां सूखने लगी हैं। किसान नागर ने बताया कि उनके बगीचे की 50 पौध इस रोग की चपेट में आकर खत्म हो गई। इसका निदान कृषि वैज्ञानिक भी नहीं तलाश पा रहे। ऐसे में यही हाल रहा तो आने वाले कुछ सालों में लोग पलायथा क्षेत्र के अमरूदों का स्वाद नहीं चख पाएंगेे।