
garlic
, प्रदेश के सर्वाधिक लहसुन उत्पादक कोटा संभाग में किसानों के अवसाद में आकर जान देने का सिलसिला शुुरू हो गया। जबकि केन्द्र सरकार के आदेश के अनुसार बाजार हस्तक्षेप योजना के तहत गत १२ अप्रेल से लहसुन खरीद शुरू हो जानी चाहिए थी। बीते आठ दिनों में खरीद की यह प्रक्रिया ऑन लाइन पंजीयन से आगे नहीं बढ़ी। इतना नहीं नोडल एजेंसी राजफैड के अधिकारी यह तक नहीं बता पा रही कि लहसुन की खरीद के लिए कितने केन्द्र खोले जाएंगे। इनका कहना है कि अभी उन्हें खरीद के आदेश ही नहीं मिले तो तैयारियां भी कैसे शुरू करें। सरकार का यह रवैया कोटा संभाग के हजारों लहसुन उत्पादक किसानों नाउम्मीद कर उन्हें घोर अवसाद में पहुचा रहा है। कोटा संभाग के चारों जिलों में भी बारां जिले में सर्वाधिक ४५ हजार हैक्टेयर रकबे में लहसुन का उत्पादन हुआ है। बीते एक माह से इसका औसत भाव १ हजार रुपए प्रति क्विंटल के आसपास बना हुआ है। एक बीघा में ८ से १० क्विंटल का उत्पादन हुआ है। ऐसे में किसानों को १० से १२ हजार रुपए प्रतिबीघा की आमदनी ही हो पा रही है, जबकि एक बीघा के लहसुन उत्पादन में लगभग २० हजार रुपए बीघा खर्च होते हैं। जो किसान जमीन मुनाफा काश्त पर लेकर लहसुन का उत्पादन कर रहे हैं, उनका उत्पादन खर्च १० हजार रुपए प्रति बीघा अधिक बैठता है। उत्पादन लागत में किसान की मेहनत-मजदूरी जोड़ दे तो यह और भी बढ़ जाता है। ऐसे में किसान की उपज का उचित दाम मिलने की आस दम तोड़ रही है और वह साल-दर-साल कर्ज के बोझ से दबता चला जा रहा है।
बारां. यहां कृषि उपज मंडी में शुक्रवार का सामान्य आकार के लहसुन का भाव ७सौ से १५ सौ रुपए प्रति क्विंटल रहे। जबकि छोटी गांठ व कलियों का भाव दो सौ से तीन सौ रुपए प्रति क्विंटल रहा। मंडी में लहसुन खरीदने वाले व्यापारी इस प्रकार के लहसुन को घटिया बता खरीदने से ही इनकार कर देते हैं। मंडी में पत्रिका ने लहसुन बेचने आए कई किसानों से चर्चा की तो उनका कहना था कि इतना हो-हल्ला मचने के बाद भी सरकार किसानों की नींद नहीं टूट रही। मंडी में करीब छह हजार से अधिक कट्टे लहसुन की आवक हुई। इससे मंडी परिसर में पूरे दिन खासी गहमा-गहमी रही, लेकिन ऐसा एक भी किसान नहीं मिला जो लहसुन के दाम पाकर खुश हुआ हो। किसानों का कहना था कि उनके ढेरी के नीलाम होने की बारी का वे बसब्री से इन्तजार करते रहे, लेकिन खरीदार औने-पौने भाव लगा आगे बढ़ते रहे। ज्यादातर किसानों का कहना था कि घर के आवश्यक जरूरतों की पूर्ति के लिए टुकड़ों में लहसुन बेच रहे हैं। सरकारी खरीद शुरू होने की उम्मीद भी बंधी हुई है।
कृषि मंत्री दे रहे कोरे आश्वासन
अधिकांश किसानों ने प्रदेश के कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी को जमकर कोसा। उन्होंने कहा कि सैनी जिले की अन्ता विधानसभा से चुने गए थे, उनके कृषि मंत्री बनने से राहत की बड़ी उम्मीद बंधी थी, लेकिन वे बीते चार वर्षों से कोरे आश्वासन दे किसानों को भ्रमित करने में ही लगे हैं।
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किसानों के फोटो
किसानों ने ऐसे बयां की पीड़ा
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अब घोर आर्थिक संकट
लहसुन का भाव दो-ढाई रुपए से पन्द्रह सौ रुपए किलो तक है। औसत उत्पादन ८ से १० क्विंटल बीघा रहा है। एक बीघा लहसुन की उत्पादन लागत १८ से २० हजार रुपए तक आती है। सरकार सोचे, किसानों को घोर आर्थिक संकट से कैसे बचाया जाए।
सुरेश मीणा, खानपुरिया मांगरोल
कैसे करें मजदूरी का जुगाड़!
लहसुन तैयार करने वाले मजदूरों की मजदूरी चुकाने के लिए जैसे-तैसे जुगाड़ कर रहे हैं। इस साल मैंने सात बीघा का लहसुन किया था, इसका कुल खर्च सवा लाख रुपए आया है। मौजूदा भाव में में आधा खर्च भी निकलना मुश्किल है।
देवकरण गुर्जर, छबड़ा
ऐसे में फेंकना पड़ेगा लहसुन
इस भाव में लहसुन बेचने से तो अच्छा है उसे फेंकना। घरों में बिना कटा लहसुन रखा है, उसे तैयार कराने में पांच सौ रुपए प्रति क्विंटल का खर्च बैठता है। फिर मंडी तक उसके परिवहन का खर्च और भी बढ़ जाता है। सरकार ने सुध नहीं ली तो किसान परिवार सड़क पर आ जाएंगे।
मुकेश मेहता नियाना
Published on:
20 Apr 2018 07:40 pm
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