12 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

जिले के लहसुन को शीघ्र मिलेगा जीआई टैग

लहसुन को भौगोलिक संकेत के रूप में पंजीकृत करने भिजवाए गए प्रस्ताव में कृषि महाविद्यालय बारां, कृषि विश्वविद्यालय कोटा तथा राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड जयपुर के सहयोग से चेन्नई के ङ्क्षगडी स्थित बौद्धिक संपदा कार्यालय में आर्वेदक समूह उत्पादकों के नाम से प्रस्तुत किया गया है।

2 min read
Google source verification

बारां

image

Mukesh Gaur

Jan 12, 2026

लहसुन को भौगोलिक संकेत के रूप में पंजीकृत करने भिजवाए गए प्रस्ताव में कृषि महाविद्यालय बारां, कृषि विश्वविद्यालय कोटा तथा राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड जयपुर के सहयोग से चेन्नई के ङ्क्षगडी स्थित बौद्धिक संपदा कार्यालय में आर्वेदक समूह उत्पादकों के नाम से प्रस्तुत किया गया है।

source patrika photo

विश्व स्तर पर लहसुन को मिलेगी पहचान

बारां. जिले के लहसुन विश्व स्तर पर पहचान के दिलवाने के लिए कृषि उपज मंडी बारां ने जीआई टैग के लिए कवायद शुरु की है। इसमें जल्द ही सफलता मिलने की उम्मीद है। लहसुन की भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री के लिए प्रस्ताव बनाकर बौद्धिक संपदा कार्यालय चेन्नई भिजवाए गए हैं। यह कवायद लहसुन उत्पादक क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगी।

कृषि उपज मंडी ने करीब एक माह पूर्व इस कवायद की शुरुआत की थी। इसके तहत लहसुन को भौगोलिक संकेत के रूप में पंजीकृत करने भिजवाए गए प्रस्ताव में कृषि महाविद्यालय बारां, कृषि विश्वविद्यालय कोटा तथा राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड जयपुर के सहयोग से चेन्नई के बौद्धिक संपदा कार्यालय में आर्वेदक समूह उत्पादकों के नाम से प्रस्तुत किया गया है। जो कि कृषि उत्पाद बाजार समिति बारां के नाम से पंजीकृत किया जाएगा।

प्रदेश में लहसुन उत्पादकता में प्रथम

दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के भूभाग पर हाड़ौती क्षेत्र में स्थित जिला फसल उत्पादन की ²ष्टि से हाड़ौती ही नहीं राजस्थान का एक महत्वपूर्ण जिला है। औषधीय श्रेणी की फसल लहसुन में क्षेत्रफल, उत्पादन और उत्पादकता की ²ष्टि से राजस्थान में प्रथम स्थान रखता है। पिछले सालों में राज्य में लहसुन की औसत 89 हजार 805 हैक्टेयर में बुवाई होकर औसत उत्पादकता 5916 किलोग्राम रही है। इसमें बारां जिले का औसत क्षेत्रफल 30 हजार 714 हैक्टेयर रहा और उत्पादकता 6133 किलोग्राम रही है। यहां पिछले तीन-चार साल से औसतन 16 लाख ङ्क्षक्वटल लहसुन पहुंच रहा है।

क्या है जीआई टैग

जीआई (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग सर्टिफिकेट किसी प्रोडक्ट को किसी खास जगह का उत्पाद साबित करता है। बताता है, यह गारंटी देता है कि उसकी खास क्वालिटी, पहचान या खासियतें उसी जगह की वजह से हैं, यह उसे गलत इस्तेमाल से बचाता है और दार्जिङ्क्षलग चाय या बासमती चावल जैसी पारंपरिक कलाओं को बढ़ावा देता है। यह इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट यह पक्का करता है कि सिफऱ् अधिकृत लोग ही उस नाम का इस्तेमाल कर सकें, इससे उस इलाके से जुड़ी असलियत और पारंपरिक जानकारी सुरक्षित रहती है।

इसलिए है यहां के लहसुन की अलग पहचान

जिले की काली मिट्टी में पोटाश की अधिक मात्रा पाई जाती है। पोटाश तत्व लहसुन की गुणवत्ता को बढ़ाता है। लहसुन की गुणवत्ता इसकी कली में पाई जाने वाली डाई एमिल डाई सल्फाइड नामक ऑरगैनो सल्फर यौगिक के कारण होता होता है। इस प्रकार से काली मिट्टी में कम तापमान से लम्बे समय तक लहसुन की गंध बनी रहती है।

डॉ. डी.के. सिंह, निदेशक, मानव संसाधन विकास (कृषि विश्वविद्यालय) कोटा

जिले के लहसुन को विश्व स्तर पर पहचान दिलवाए जाने के लिए कवायद शुरु की गई है। इसके लिए करीब एक माह पूर्व जीआई टैग के लिए प्रस्ताव बनाकर भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री के लिए प्रस्ताव बनाकर बौद्धिक संपदा कार्यालय ङ्क्षगडी चेन्नई भिजवाए गए है। जहां से इसके स्वीकृत होने की पूरी उम्मीद है। इसके पश्चात जिले के लहसुन की अपनी एक अलग पहचान होगी। जिससे उत्पादकता के साथ ही विपणन क्षेत्र को भी बढ़ावा मिलेगा।

हरिमोहन बैरवा, सचिव, कृषि उपज मंडी, बारां