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भाजपा खेमें में 10 हजार और सपा खेमे में 15 हजार वोटों के अंतर से जीत का अनुमान

नगर निगम समेत 16 नगरपालिका और नगर पंचायतों के लिए 11 मई को वोट डाले गए। इनमें नगर निगम में वोटों का प्रतिशत सबसे कम रहा। कम वोट पड़ने से राजनीतक पंडित भी हैरान रह गए। भाजपा और सपा-रालोद समर्थित प्रत्याशी की जीत का गणित उलझकर रह गया। बरेली नगर नगम में मात्र 40.99 प्रतिशत मतदान होने से भाजपा और सपा समर्थित दलों के प्रत्याशियों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं।

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भाजपा-सपा प्रत्याशी के समर्थकों ने पूरे दिन लगाया जीत का गुणा-भाग
- आरएएस ने बूथवार आंकड़े एकत्र करके की समीक्षा, कमियों की बनाई रिपोर्ट

बरेली। नगर निगम समेत 16 नगरपालिका और नगर पंचायतों के लिए 11 मई को वोट डाले गए। इनमें नगर निगम में वोटों का प्रतिशत सबसे कम रहा। कम वोट पड़ने से राजनीतक पंडित भी हैरान रह गए। भाजपा और सपा-रालोद समर्थित प्रत्याशी की जीत का गणित उलझकर रह गया। बरेली नगर नगम में मात्र 40.99 प्रतिशत मतदान होने से भाजपा और सपा समर्थित दलों के प्रत्याशियों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। वहीं बसपा और कांग्रेस प्रत्याशियों को तो मतदान के कम प्रतिशत से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा क्योंकि दोनों दलों के प्रत्याशियों को तो स्वयं भी अपनी जीत की उम्मीद नहीं है। बसपा और कांग्रेस के बीच तो लड़ाई इस बात को लेकर है कि किसको कितने वोट मिलते हैं। मगर, भाजपा और सपा-रालोद समर्थित प्रत्याशियों के चुनाव दफ्तरों में मतदान के बाद पूरे दिन दिन जीत-हार का गणित लगा। दोनों दल के समर्थकों ने अपने हिसाब से प्रत्याशियों को जीत का गणित समझाकर नजदीकी दर्शाने की कोशिश की। प्रत्याशी भी समर्थकों की बात सुनकर कुछ समय के लिए ही सही, मगर अपनी जीत के प्रति आश्वास्त नजर आए। मतगणना में ज्यादा वक्त नहीं है। इसलिए प्रत्याशियों के पास खुश होने के लिए सिर्फ 24 घंटे ही बचे थे। चुनावी समर में कौन जीतेगा और कौन किसके मुकाबले खेत रहेगा। यह शनिवार को होने वाली मतगणना के बाद ही पता चलेगा।

निर्वतमान महापौर और भाजपा प्रत्याशी डॉ. उमेश गौतम ने अपनी ही पार्टी से टिकट हासिल करने में पूरी ताकत लगा दी थी क्योंकि भाजपा में तमाम टिकट दावेदार पहले से थे। उसके बाद उन्होंने चुनाव प्रचार में पूरी ताकत लगाई। इसकी वजह यह मानी गई कि भाजपा में उमेश गौतम टिकट को लेकर बड़े नेताओं में मतभेद थे। सूत्रों के अनुसार भाजपा के बड़े नेता नहीं चाहते थे कि डॉ. उमेश गौतम को दोबारा भाजपा से महापौर का टिकट मिले। मगर, हाईकमान ने पार्टी के अंदरूनी विरोध को दरकिनार करते हुए डॉ. उमेश गौतम पर ही दोबारा अपना भरोसा जताया। जब भाजपा के टिकट की घोषणा हुई तो बाकी दावेदार और नेता दिखावे के लिए ही प्रचार में दिखे। अपने चुनाव जैसी सक्रिय भूमिका देखने उनके अंदर को नहीं मिली। यहां तक भाजपा के महानगर संगठन के अलावा अन्य अनुसांगिक संगठनों ने भी उमेश गौतम के चुनाव प्रचार में उतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई, जितनी कि हर चुनाव में इनकी रुचि दिखती है। इन सबका नतीजा यह निकला कि भाजपा कैडर से जुड़े मतदाता वोट डालने घर से निकले ही नहीं। इसका खामियाजा दोनों में से किसी भी प्रत्याशी को उठाना पड़ सकता है।


बहुत उत्साहित नहीं दिखे मतदाता
शहर के अधिकांश वार्डों में 28 से 30 प्रतिशत ही मतदान का आंकड़ा निकलकर सामने आया है। राजनीतिक पंडित चुनाव बाद मुस्लिम बहुल इलाकों में हमेशा ही भाजपा के विरोध में एकतरफा वोट पड़ने का अनुमान लगाते हैं, मगर इस बार मुस्लिम बहुल बूथों पर भी 35 प्रतिशत से अधिक वोट नहीं पड़ पाए हैं। मतलब, मुस्लिम समुदाय में भी मतदान को लेकर बहुत अधिक उत्साह नहीं था। राजनीतिज्ञ इस बात का अब भी अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं कि मुस्लिम वोट भाजपा के विरोध में एकतरफा पड़ा या फिर बसपा और कांग्रेस में बंट गया। सपा समर्थकों को यह उम्मीद है कि निर्दलीय प्रत्याशी डॉ. आईएस तोमर के पक्ष में मुस्लिम वोट हमेशा की तरह एक तरफा पड़ा है। वहीं भाजपा के समर्थन यह अनुमान लगाए हुए हैं कि मुस्लिम बसपा और कांग्रेस में बंटने के अलावा कुछ वोट उनकी पार्टी यानी कि भाजपा को भी मिला है। भले ही वह पसमांदा मुस्लिम ही क्यों न हों। हिंदू वोटरों को भाजपा समर्थक अपनी ओर मानकर चल रहे हैं। सपा-रालोद प्रत्याशी समर्थकों का दावा है कि नगर निगम चुनाव में हिंदू वोटों भी विभाजन हुआ। भाजपा विरोधी के अलावा असंतुष्ट नेताओं का समर्थक हिंदुओं का वोट डॉ. आईएस तोमर को मिलने का अनुमान है। कुल मिलाकर हिंदू और मुस्लिम वोटों के विभाजन के अनुमान ने महापौर और पार्षद प्रत्याशियों का मुकाबला कांटे का बना दिया है।


पार्षद प्रत्याशियों का भी बदलेगा गणित
नगर निगम चुनाव में वोट कम पड़ने का नुकान केवल महापौर प्रत्याशियों को ही नहीं हुआ है। कम वोटिंग से शहर के 80 वार्डों में पार्षद प्रत्याशियों के राजनीतिक समीकरण भी बदलेंगे। भाजपा ने इस बार बड़ी संख्या में अपने पुराने पार्षदों के टिकट काट दिए थे। उनमें से अधिकांश ने बागी बनकर निर्दलीय चुनाव लड़ा। यही हाल सपा और अन्य दलों के पार्षद प्रत्याशियों का है। निर्दलीय पार्षद प्रत्याशियों के चुनाव लड़ने से तमाम समीकरण बदल चुके हैं। राजनीतिक पंडितों का अनुमान है कि मतगणना वाले दिन इस बार अधिकांश वार्डों में पार्षद प्रत्याशियों के बीच कांटे का मुकाबला देखने को मिलेगा। बहुत से पार्षद प्रत्याशियों की हार-जीत 10 या 20 वोटों से भी हो सकती है।


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