अधिक मास में धार्मिक अनुष्ठानों का मिलेगा विशेष फल, जानिए पूजा विधि और वर्जित कार्य

सौर वर्ष तथा चन्द्र वर्ष का प्रतिवर्ष 11 दिनों का अन्तर तीन वर्ष में 33 दिन हो जाता है, इसी कारण प्रति तीसरे वर्ष अधिकमास होता है।

By: अमित शर्मा

Published: 16 May 2018, 05:47 PM IST

बरेली। अधिकमास बुधवार से प्रारम्भ हो गया है और ये 13 जून तक रहेगा। इस दौरान शादी विवाह समेत मांगलिक कार्य नहीं होंगे जबकि इस दौरान धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष फल मिलेगा। बालाजी ज्योतिष संस्थान के ज्योतिषाचार्य पंडित राजीव शर्मा के अनुसार भारतीय ज्योतिष मासों की गणना चन्द्र गति के आधार पर की जाती है और वर्ष गणना सूर्य गति के आधार पर होती है। इस प्रकार दोनों की गणना में लगभग 11 दिनों का अन्तर आता है। इस अन्तर को बराबर करने के लिए लगभग 30 माह पश्चात अधिकमास की व्यवस्था की जाती है, जिससे दोनों में साम्यता बनी रहे। कभी-कभी इस प्रक्रिया में क्षय मास भी आ जाते हैं। सौर वर्ष तथा चन्द्र वर्ष का प्रतिवर्ष 11 दिनों का अन्तर तीन वर्ष में 33 दिन हो जाता है। इसी कारण प्रति तीसरे वर्ष अधिकमास होता है। अधिक मास को ”मल मास, पुरूषोत्तम मास“ आदि नामों से भी जाना जाता है।

Adhik mass

कब तक रहेगा अधिकमास

जिस चान्द्र वर्ष में अधिक मास आता है, उस वर्ष में 13 माह और 383 अथवा 384 दिन होते हैं। वैशाख, ज्येष्ठ, आषाण, श्रावण, भाद्र पद एवं आश्विन मास ही अधिक मास हो सकते हैं। वर्तमान वर्ष में ज्येष्ठ माह अधिक मास के रूप में है। इस वर्ष ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी अर्थात 14 मई को सूर्य ने वृषभ निरयण राशि में प्रवेश किया, सूर्य का मिथुन राशि में प्रवेश 15 जून 2018 को ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया के दिन होगा। इस दौरान दोनों अमावस्या के मध्य कोई भी संक्रांति नहीं आने के कारण यह अधिक मास घटित हो रहा है। ज्येष्ठ माह एक मई को प्रारम्भ होकर तथा 16 मई से 13 जून तक रहेगा। 14 जून से 28 जून तक ज्येष्ठ माह का शुक्ल पक्ष रहेगा। उत्तर भारत में मध्य माह अधिक मास के रूप में माना जाता है।

कैसे करें पूजा

इस मास में व्यक्ति द्वारा जो भी व्रत, उपवास, दान, पुण्य, पूजा आदि किये जाते हैं, उसका कई गुना फल मिलता है। इसलिए इसे पुरूषोत्तम मास कहते हैं। लक्ष्मी सहित नारायण का अधिक मास में षोडशोपचार पूजन करने का विशेष महत्व है। लक्ष्मी और नारायण को विविध नामों से बोलकर पूजा करने के पश्चात पुष्प अर्पित करना चाहिए। पूजा के अन्त में जल पात्र में कुमकुम, अक्षत, पुष्प मंत्रों के साथ चढ़ाना चाहिए। इस मास में घी-गुड़ से 33 मालपुये को कांस्य पात्र में रखकर भगवान लक्ष्मी नारायण को अर्पण करना चाहिए। अन्त में उनसे प्रार्थना करना चाहिए। इस अधिकमास में व्रत करने से कुरूक्षेत्रादि में स्नान, गोदान, भूमिदान, स्वर्ण दान आदि के तुल्य फल प्राप्त होता है।

अधिकमास में वर्जित कार्य

अधिकमास में बोरिंग, तालाब, कुंआ आदि का निर्माण नहीं कराना चाहिए। गृह प्रवेश, अधिमास में व्रत का आरम्भ एवं उद्यापन भी नहीं करना चाहिए। अधिकमास में मांगलिक कार्य भी सम्पन्न नहीं किया जाना चाहिए। इस मास में बालकों के होने वाले संस्कार भी नहीं किये जाते हैं। इस मास में किसी देव अथवा तीर्थ का पहली बार दर्शन करना भी उचित नहीं होता। इस अधिकमास में पद ग्रहण एवं शुभ कर्म इत्यादि अनेक कार्य वर्जित होते हैं। परन्तु अधिक मास में तर्पण, अन्नप्राशन संस्कार इत्यादि किये जा सकते हैं। इस मास में जौ, तिल, गौ, भूमि, सोना इत्यादि दान, संध्या और पूजन कर पूर्णिमा का यज्ञ, नित्य हवन आदि भी किये जा सकते हैं।

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अमित शर्मा
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