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शब्दों में माटी की खुशबू ‘थोड़ा हटकर’ में संवेदनाओं की सरिता, पूर्व आईजी की काव्यधारा ने जगाई संस्कृति की चेतना, सजा साहित्यिक मेला

शहर की साहित्यिक चेतना उस समय भाव-विभोर हो उठी, जब रचनात्मक लेखन मंच न्यास, वाराणसी की उपशाखा बरेली ने रामपुर गार्डन स्थित सभागार में पूर्व आईजी डॉ राकेश सिंह की चर्चित कृति ‘थोड़ा हटकर’ पर विमर्श एवं सम्मान समारोह का भव्य आयोजन किया।

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बरेली। शहर की साहित्यिक चेतना उस समय भाव-विभोर हो उठी, जब रचनात्मक लेखन मंच न्यास, वाराणसी की उपशाखा बरेली ने रामपुर गार्डन स्थित सभागार में पूर्व आईजी डॉ राकेश सिंह की चर्चित कृति ‘थोड़ा हटकर’ पर विमर्श एवं सम्मान समारोह का भव्य आयोजन किया। यह आयोजन केवल पुस्तक चर्चा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, संवेदना और ग्राम्य जीवन की स्मृतियों का जीवंत उत्सव बन गया।

कार्यक्रम में संस्था सचिव डॉ. विनीता सिंह सिसोदिया और गौरव सिंह ठाकुर ने काव्य संग्रह से चयनित रचनाओं का सजीव पाठ कर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। कविताओं में ग्रामीण जीवन की सोंधी महक, बदलते समय के साथ रिश्तों की दरकती दीवारें और आधुनिकता की आपाधापी में खोती मानवीय संवेदनाओं का मार्मिक चित्रण उभरकर सामने आया। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि निरुपमा अग्रवाल ने कहा कि कविता ‘अपने आस-पास’ की पंक्तियों ने जैसे आत्ममंथन की लौ जला दी हो। समाज में बढ़ती संवेदनहीनता और भ्रष्टाचार के प्रति हमारी निष्क्रियता पर तीखा प्रश्न खड़ा किया। वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान भौतिकतावादी युग में जब मनुष्य अपनी जड़ों से कटता जा रहा है, ऐसे में यह कृति एक चेतावनी भी है और एक मार्गदर्शक भी। परिवार, बचपन, गांव और रिश्तों की टूटती कड़ियों पर प्रश्न उठाते हुए पुस्तक यह संदेश देती है कि यदि आने वाली पीढ़ी को संस्कारों से नहीं जोड़ा गया, तो विकास की अंधी दौड़ में हमारी सांस्कृतिक विरासत पीछे छूट जाएगी।

‘छूटे हुये लोग’ ने जगाई स्मृतियों की टीस

डॉ. अखिलेश गुप्ता ने ‘छूटे हुए लोग’ कविता का पाठ करते हुए गांव के बिछड़े परिवेश की पीड़ा को जीवंत कर दिया। “पीछे छूटा है खलिहान, बाग-बखरी, पोखर और दालान” जैसी पंक्तियों ने श्रोताओं को उस भावभूमि में पहुंचा दिया, जहां स्मृतियों की धुंध में गांव की माटी पुकारती प्रतीत होती है।

साहित्यिक विभूतियों की गरिमामयी उपस्थिति

कार्यक्रम की अध्यक्षता शायर विनय सागर जायसवाल ने की, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में हिमांशु श्रोत्रिय मौजूद रहे। मंच पर मुख्य अतिथि निरुपमा अग्रवाल, सत्यवती सत्या, राजबाला धैर्य, मनीषा आहूजा, उमेश चंद्र गुप्ता, मनोज दीक्षित ‘टिंकू’, लोटा मुरादाबादी सहित अनेक साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से कार्यक्रम को समृद्ध किया।

साहित्य प्रेम बना प्रेरणा, मिला सम्मान

कार्यक्रम संयोजिका गरिमा भारद्वाज ने कहा कि प्रशासनिक दायित्वों के उच्च पद पर रहते हुए भी डॉ. राकेश सिंह का साहित्य के प्रति समर्पण समाज के लिए प्रेरणास्रोत है। इस अवसर पर सभी साहित्यकारों का अंगवस्त्र, माल्यार्पण और सम्मान के साथ अभिनंदन किया गया।

हिंदी और संस्कृति के संरक्षण का संकल्प

कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रीय कवि रोहित राकेश के ओजस्वी संचालन ने वातावरण में ऊर्जा बनाए रखी। आयोजकों ने हिंदी दिवस पर पुनः भव्य साहित्यिक आयोजन करने की घोषणा करते हुए भारतीय भाषा, संस्कृति और संस्कारों को संरक्षित रखने का संकल्प दोहराया।