
Camel news barmer
भवानीसिंह राठौड़@बाड़मेर. लंबी कद-काठी, ऊंची गर्दन, पीठ पर मजबूत कूबड़, भूरी और काली रंगत वाला जवान ऊंट जब रेगिस्तान में मचककर चलता है तो देखते ही बनता है। लेकिन इसका उपयोग कम होने का नतीजा है कि भारत प्रसिद्ध पशुमेले में ऊंटों का मोल चौथाई पर आ गिरा और उष्ट्र पालकों के चेहरे पर निराशा झलक रही थी। ऊंट को राज्यपशु का दर्जा तो मिल गया लेकिन रेगिस्तान का जहाज अपने वजूद के लिए जंग लडऩे लगा है।
पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा पशुमेला है तिलवाड़ा, जिसकी देशभर में करीब 600 साल से प्रसिद्धि है। यहां मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, दिल्ली, हरियाणा सहित कई राज्यों से पशुपालक और व्यापारी पहुंचते हैं। बैल, ऊंट और घोड़ों की मेले में बरसों तक रंगत रही है लेकिन इस बार यहां रेगिस्तान का जहाज अपनी रंगत खोता नजर आया।
कीमत के लिए जंग
दो साल पहले आज कीमत
1 लाख - 25 हजार
50 हजार- 15 हजार
25 हजार- 3 से 5 हजार
1000 आए बिके 30 ही
मेले में 1000 ऊंट आए हैं जो पिछले साल से आधे भी नहीं हैं। मेले में तीस ऊंटों की बिक्री हुई है,जिनके दाम भी बहुत कम मिले हैं। शेष 970 ऊंट अभी तक नहीं बिके हैं। पशुपालक निराश मन से लौट रहे हैं।
क्यों कम हुआ क्रेज
- सड़कों की सुविधा से ऊंटों से परिवहन हुआ कम।
- मोटरसाइकिल आने से गांवों में अब ऊंट की जगह दुपहिया का उपयोग।
- ऊंट को राज्यपशु घोषित करने के बाद कई तरह की पाबंदियां।
ऊंटों की बिक्री कम
- ऊंटों की बिक्री कम हुई है। पशुपालक यहां 1000 के करीब ऊंट लेकर पहुंचे थे, तीस ही बिके हैं।-डॉ. अमीलाल सहारण, मेलाधिकारी
Published on:
05 Apr 2019 12:22 pm
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