
Doctor Strike: Wandering patients and families from seven days
बाड़मेर. सेवारत चिकित्सकों की हड़ताल को सात दिन बीत गए हैं। चिकित्सक मांगों को लेकर अड़े हुए हंै और रेस्मां लागू होने से गायब है। सरकार ने व्यवस्था प्रशासन को दे दी है। प्रशासन ने आयुष चिकित्सक और सिर गिनाने को कुछ अन्य चिकित्सक लगाकर वैकल्पिक इंतजाम कर लिया। लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था मरीजों पर भारी पड़ रही है। उपचार को निजी अस्पतालों, जोधपुर और गुजरात जाना मजबूरी बना हुआ है। नि:शुल्क दवा और उपचार के दौर में गरीबों को इलाज के लिए हजारों रुपए का कर्जदार होना पड़ रहा है। गांव से शहर तक लोग इलाज के लिए भटकने को मजबूर है।
नहीं आए मेडिकल कॉलेज से डॉक्टर
मरीजों को राहत देने के लिए संयुक्त निदेशक डॉ संजीव जैन की ओर से जारी आदेश के बाद भी शुक्रवार देर शाम तक कोई डॉक्टर नहीं पहुंचा। आयुष व निजी संगठनों के डॉक्टर मरीजों की जांच कर रहे हैं। वहीं गंभीर रोगियों को प्राथमिक उपचार के बाद रैफर किया जा रहा है।
केस 1- एक मासूम ग्यारह साल का। चार माह पहले करंट से झुलस गया था। जोधपुर में परिजनों ने भर्ती कर उपचार करवाया। फिर बाड़मेर ले आए थे। खाना-पीना कम था। परिजन उसका हर पल ध्यान रख रहे थे। एक-एक सांस से उम्मीद थी। हर घड़ी ङ्क्षचता थी। मां की पलक नहीं झपकती थी और पिता की आंखें कितने ही दिन से नींद नहीं ले रही थी। इधर चिकित्सकों की हड़ताल हुई और उधर इसकी तबीयत खराब। अस्पताल लाए पर....सांसे टूट गई। भले ही यह नियती को मंजूर था पर परिवार यही कहता है कि काश, चिकित्सकों की हड़ताल न होती...।
केस 2- दो मासूम बच्चियां जिसमें एक दूध मुंही। तीसरी संतान पेट में। प्रसव पीड़ हुई तो मां दोनों बेटियों को यह कहकर गई कि एक दूजे का ख्याल रखना, मैं आती हूं। प्रसूता को इलाज को निम्बलकोट सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र ले गए यहां उपचार नहीं मिल पाया और न समय पर एम्बुलंेस। प्रसूता ने बच्ची को जन्म दे दिया लेकिन तबीयत बिगड़ गई। परिजन जिला अस्पताल लेकर आए उन्हें क्या मालूम था कि यहां पर भी कोई नहीं है। महिला ने दम तोड़ दिया। दोनों मासूम बच्चियां जो घर पर इंतजार कर रही थी एक ही सवाल कर रही है मां, भाऊ को लेकर नहीं आई...। जवाब किसी के पास नहीं है....।
Published on:
23 Dec 2017 11:19 am
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