
पाकिस्तान से लगती सीमा में क्यों चर्चित है पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का नाम ...पढ़ें पूरी खबर
बाड़मेर. सरकारों की बेरुखी और तकनीक के दौर में लघु और कुटीर उद्योग लगभग दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। रेगिस्तानी इलाका जहां एक जमाने में लघु और कुटीर उद्योगों की बाढ़ रहती थी। अब बीते जमाने की बात हो रही है। इस बीच, राहत की बात यह है कि पाकिस्तान से लगती सीमा पर बनने वाली पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी (rajeev gandhi) के नाम की शॉल आज भी देशभर में पसंद की जा रही है। यहां की शॉल देश की राजधानी दिल्ली में कनॉट प्लेस पर धड़ल्ले से बिकती है। पट्टू और चुनरी की भी काफी डिमांड है।
ये खासीयत
शॉल और पट्टू की खासीयत यह है कि यह मेरीनो ऊन से बनते हैं। चुनरी पर कशीदाकारी होती है। एक शॉल की कीमत दो हजार से लेकर चार हजार तक है। पट्टू और चुनरी भी ऊंचे दामों में बिकते हैं। बाड़मेर जिले में गिराब के पास बैकुण्ठ ग्राम और जैसलमेर जिले की झिनझिनयाली गांव के शास्त्री ग्राम में शॉल, पट्टू और चुनरी तैयार किए जा रहे हैं। तीनों हैण्डमेड है। बाड़मेर (barmer) की शॉल, पट्टू (सर्दियों में ओढ़ने का ऊनी वस्त्र), चुनरी का कारोबार पन्द्रह से बीच लाख रुपए सालाना है। केन्द्र सरकार का खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग यह सेंटर संचालित कर रहा है। यहां का उत्पाद खादी आयोग के जरिए बड़े शहरों में बेचा जाता है। शॉल का नामकरण पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर किया हुआ है। राजीव को शॉल काफी पसंद था और वे अधिकांशतया शॉल अपने बदन पर लपेट कर रखते थे।
सरकार थामे हाथ तो हो सकती है बल्ले-बल्ले
थार के इस उद्योग को सरकार के सहारे की बहुत जरूरत है। सरकार यदि बुनकरों और रुई कातने वालों को पर्याप्त मेहनताना दे और संसाधन बढ़ाए तो इस उद्योग की बल्ले-बल्ले हो सकती है। सरकारों की बेरुखी के कारण हैण्डमेड शॉल और पट्टू बनाने वाले बुनकरों की संख्या दिनों-दिन कम हो रही है। इसमें मेहनत ज्यादा लगती है और मेहनताना बहुत कम मिल रहा है। ऐसे में बुनकर रुचि नहीं ले रहे। जबकि, हैंडमेड उत्पाद देशभर में पसंद किया जा रहा है।
Published on:
30 Aug 2022 05:54 pm
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