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‘चपरासी बनेगा तो भी मेरे लिए कलक्टर ही होगा’, जानिए बाड़मेर के 3 RAS चयनित युवाओं के पिता के संघर्ष की कहानी

Father's Day 2026: राजस्थान के बाड़मेर जिले के 3 आरएएस चयनित स्वरूपसिंह उण्डखा, प्रमिला सऊ और रामाराम भियांड़ की सफलता के पीछे उनके पिता का संघर्ष छिपा हुआ है। जानिए 3 अफसरों के पिता की प्रेरक कहानी-

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बाड़मेर

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Santosh Trivedi

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भवानी सिंह राठौड

Jun 21, 2026

RAS Swaroop Singh

स्वरूपसिंह उण्डखा पिता के साथ। फोटो: पत्रिका

Ras Success Story: बाड़मेर। सरकारी नौकरी में चयन की खबर अक्सर एक नाम, एक रैंक और एक उपलब्धि तक सीमित रह जाती है, लेकिन उसके पीछे वर्षों का संघर्ष, असफलताओं का दर्द, घर की आर्थिक तंगी और परिवार का मौन त्याग छिपा होता है। बाड़मेर जिले के तीन चयनित आरएएस अभ्यर्थी स्वरूपसिंह उण्डखा, प्रमिला सऊ, रामाराम भियांड़ और रीट के टॉपर हंसराज पूरी की कहानियां इसी सच्चाई को सामने लाती हैं। इन चारों की सफलता के पीछे उनके पिता का संघर्ष, अनुशासन, भरोसा और वह जिद खड़ी है, जिसने अभावों के बीच भी बच्चों के सपनों को टूटने नहीं दिया।

1. स्वरूपसिंह उण्डखा: पिता ने चाय छोड़ी, बेटे ने हार नहीं मानी

उण्डखा गांव के स्वरूपसिंह की शुरुआती पढ़ाई गांव के पास ही हुई। पांचवीं तक स्कूल पास था, लेकिन आगे बढऩे के लिए संघर्ष बढ़ता गया। आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई का रास्ता आसान नहीं था। जयपुर में तैयारी के दौरान हर महीने करीब 10 हजार रुपए का खर्च आता था, जबकि घर की आर्थिक स्थिति बेहद सीमित थी। उनके पिता नींबसिंह उण्डखा ने 26 साल तक हैंडिक्राफ्ट फैक्ट्री में काम किया। बेटे की पढ़ाई के लिए उन्होंने अपने छोटे-छोटे खर्च भी काट दिए।

स्वरूपसिंह बताते हैं कि पिता ने चाय पीना तक छोड़ दिया, ताकि हर महीने बचने वाले पैसों से किताब खरीदी जा सके। जयपुर में तैयारी के शुरुआती दिनों में उनका बैग और सामान चोरी हो गया, तब वे बुरी तरह टूट गए थे। 2023 में आरएएस मेंस भी नहीं निकाल पाए, लेकिन पिता हर बार हिम्मत देते रहे। आखिरकार 2024 में 392वीं रैंक के साथ उनका चयन हुआ। स्वरूपसिंह कहते हैं कि पिता हमेशा कहते थे, "चपरासी बनेगा तो भी मेरे लिए कलक्टर ही होगा।" यही विश्वास उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

2. प्रमिला सऊ: दिहाड़ी मजदूर पिता ने बेटी के सपनों के आगे हर मुश्किल छोटी कर दी

भूरटिया की प्रमिला सऊ की कहानी केवल एक चयन की नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज की उस सोच से लड़ने की भी कहानी है, जहां बेटियों की पढ़ाई अक्सर जल्दी शादी के दबाव में छूट जाती है। प्रमिला के पिता हनुमानराम दिहाड़ी मजदूर रहे हैं। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन उन्होंने शुरुआत से ही तय कर लिया था कि बेटा-बेटी में कोई फर्क नहीं होगा। कई बार कर्ज लेकर भी बेटी की पढ़ाई जारी रखी।


प्रमिला बताती हैं कि पिता ने उन्हें साइंस दिलाई, लेकिन जब प्रमिला की रुचि उस विषय में नहीं रही तो उन्होंने बिना दबाव कहा "जो तुझे सही लगे, वही कर।" यही भरोसा आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। जब समाज में कम उम्र में शादी की बात होती थी, तब पिता साफ कहते "मेरी बेटी जब सक्षम होगी, तभी उसकी शादी करूंगा।" स्नातक और पीजी कॉलेज की पढ़ाई के बाद प्रमिला ने सिविल सेवा की तैयारी शुरू की। तीसरे प्रयास में प्रमिला ने आरएएस 2024 में 398वीं रैंक हासिल कर पिता के विश्वास को सच कर दिखाया।

3. रामाराम भियांड़ : पिता की डांट ने सिखाया अनुशासन

रामाराम भियांड़ की सफलता के पीछे पिता जगुराम की सख्ती, अनुशासन और लगातार दिया गया मनोबल सबसे बड़ी ताकत रहा। रामाराम बताते हैं कि बचपन में एक दिन वे घर से स्कूल जाने के लिए निकले, लेकिन स्कूल नहीं पहुंचे। जब यह बात पिता को पता चली तो उन्होंने सख्ती दिखाई। रामाराम मानते हैं कि वही घटना उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट बन गई। उसके बाद उन्होंने कभी स्कूल मिस नहीं किया।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान कई उतार-चढ़ाव आए। 2021 में 489वीं रैंक आने के बावजूद उन्हें कोई सेवा आवंटित नहीं हुई। यह बड़ा झटका था, लेकिन पिता ने उनका हौसला टूटने नहीं दिया। हर बार घर आने पर वे कहते "अबकी बार तेरा पक्का होगा।" यही शब्द रामाराम के लिए संजीवनी बन गए। उन्होंने दोगुनी मेहनत की और आखिरकार आरएएस 2024 में 224वीं रैंक हासिल कर पिता की सीख और विश्वास को सम्मान दिलाया।

रीट टॉपर हंसराज : पिता की अधूरी पढ़ाई, बेटे के लिए बन गई सबसे बड़ी प्रेरणा

रीट टॉपर हंसराज पूरी के पिता शांत पूरी की कहानी संघर्ष, त्याग और जिम्मेदारी की मिसाल है। शांत पूरी बचपन से ही मेधावी थे, लेकिन परिवार की परिस्थितियों ने उनकी पढ़ाई कक्षा 6 के बाद ही छुड़वा दी। जिस उम्र में किताबें हाथ में होनी चाहिए थीं, उस उम्र में उन्होंने काम संभाल लिया। परिवार की जिम्मेदारियों के लिए उन्होंने अपनी बाल्यावस्था और किशोरावस्था मेहनत की भट्टी में झोंक दी।


बाद में परिवार के बेहतर भविष्य के लिए वे अहमदाबाद जाकर काम करने लगे। घर से दूर रहना उनकी मजबूरी थी। साल में सिर्फ होली, दीपावली या किसी पारिवारिक कार्यक्रम पर ही घर आ पाते, लेकिन इस दूरी को उन्होंने कभी शिकायत नहीं बनने दिया। वे आज भी अपने सारे काम खुद करते हैं खाना बनाना, कपड़े धोना, सफाई करना और किसी पर निर्भर नहीं रहते। यही आत्मनिर्भरता, ईमानदारी और कर्मठता हंसराज के लिए सबसे बड़ी सीख बनी।

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