23 अक्टूबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

450 साल पहले महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के बीच लड़ा गया था हल्दीघाटी का युद्ध, परिणाम को लेकर छिड़ी नई बहस

Battle of Haldighati: 450 साल पहले महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के बीच हल्दीघाटी के मैदान पर युद्ध हुआ था। आज भी इतिहास की किताबों में युद्ध के परिणाम मुगलों के ही पक्ष में बताया जाता है लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रमों ने इस पर नई बहस छेड़ दी है। जानिए क्या कहते हैं जानकार-
4 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

उदयपुर

•

image

Santosh Trivedi

•

Updated: 18 Jun 2026, 1:29 PM IST

Maharana Pratap

फाइल फोटो पत्रिका

Battle of Haldighati: 450 साल पहले महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के बीच हल्दीघाटी के मैदान पर युद्ध हुआ था। आज भी इतिहास की किताबों में युद्ध के परिणाम मुगलों के ही पक्ष में बताया जाता है लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रमों ने इस पर नई बहस छेड़ दी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बुधवार को उदयपुर में महाराणा प्रताप जयंती और हल्दीघाटी विजय सार्द्ध चतु:शती समारोह में कहा कि हमें समझना होगा कि हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप ही नहीं, भारत के पक्ष से लड़ने वाले लोगों की विजय हुई। जो हुआ, तथ्य उसके विपरीत दिखाए गए। मुगलों के इतिहासकारों ने जो लिखा, वही सुनते रहे हैं। नैरेटिव बनने वाले इतिहासकार होते हैं, वैसे ही उस जमाने में भी थे।

अब अगर आरएएस या दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं में इस युद्ध के परिणामों को लेकर सवाल पूछे जाएं तो क्या-क्या जवाब हो सकते हैं? ये जवाब पता करने के लिए 'पत्रिका' ने प्रदेश के प्रमुख विश्वविद्यालयों के इतिहास विभाग के प्राध्यापकों, इतिहासकारों की परीक्षा ली। उन्हें एक प्रश्न दिया और उसका उत्तर अधिकतम 150 शब्दों में देने को कहा। कई प्रोफेसर्स ने कहा कि ज्यादा नंबर तो उसे ही मिलेंगे जो उत्तर में महाराणा प्रताप की जीत की बात लिखेगा।

यह सवाल पूछा - महाराणा प्रताप और मानसिंह के बीच लड़े गए हल्दीघाटी युद्ध का क्या परिणाम रहा, प्रमाणों के साथ बताएं?

जीती हुई जमीन पर कौन करता है हमले?

हल्दीघाटी युद्ध में रणनीतिक रूप से महाराणा प्रताप की विजय हुई थी। मध्यकाल में वास्तविक जीत का मापदंड विरोधी को बंदी बनाना, उसके किलों पर अधिकार और राजस्व वसूलना था, जिसमें अकबर विफल रहा। प्रताप को पकड़ने या मारने में नाकाम रहने पर अकबर ने सेनापति मानसिंह की 'डोढ़ी बंद' (दरबार में प्रवेश पर रोक) कर दी थी, जो उसकी हताशा का बड़ा प्रमाण है। इतिहासकार बदायूनी के अनुसार मुगलों में प्रताप का ऐसा भय था कि उन्होंने गोगुंदा में अपने टेंट के चारों ओर 10 फीट गहरी खाई खोदी थी। युद्ध के बाद मेवाड़ पर मुगलों का न तो कोई प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित हुआ और न ही उनके सिक्के चले। स्वयं अकबर ने हल्दीघाटी का मुआयना किया और 1585 तक चार बार और आक्रमण किए। इतिहास गवाह है कि जीती हुई जमीन पर बार-बार हमले नहीं किए जाते। अंततः प्रताप ने अपनी छापामार नीति से मेवाड़ की लगभग सभी मुगल चौकियों को मुक्त करा लिया।

  • चंद्रशेखर शर्मा, इतिहासकार

एक अपूर्ण और अनिर्णायक युद्ध

मध्यकालीन भारत के तार्किक पैमानों के आधार पर हल्दीघाटी मुगलों की सामरिक विजय थी, लेकिन राजनीतिक रूप से यह एक अपूर्ण और अनिर्णायक युद्ध था। मैदान पर अधिकार के तहत मुगलों की जीत हुई। 'अकबरनामा' के अनुसार, मुगलों ने प्रताप का शिविर, तोपखाना और ध्वज छीनकर रणभूमि पर नियंत्रण बनाए रखा, जिससे प्रताप को पीछे हटना पड़ा। शत्रु राजा को बंदी बनाने में मुगल विफल रहे। मुगलों ने गोगुंदा, कुम्भलगढ़ और उदयपुर पर कब्जा तो किया, लेकिन 'राजप्रशस्ति' गवाह है कि प्रताप ने समर्पण नहीं किया और 1585 तक अधिकांश मेवाड़ पुनः मुक्त करा लिया। राज्य के पूर्ण विलय पर इतिहासकार इरफान हबीब के अनुसार, मुगलों को केवल पूर्वी मेवाड़ का राजस्व मिला पर रणनीतिक अधीनता अधूरी रही। ऐसे में कहा जा सकता है कि मुगल सेना मैदान जीतने में तो सफल रही पर मेवाड़ की सत्ता और प्रताप को नहीं डिगा सकी जबकि नैतिक विजय की अवधारणा बाद की राष्ट्रवादी व्याख्या है।

  • भानु कपिल, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास

शत्रु पर पूर्ण प्रभाव ही जीत का प्रमाण

हल्दीघाटी युद्ध को मुगलों की विजय नहीं कहा जा सकता। वे न तो राणा प्रताप को बंदी बना सके और न ही अधीनता स्वीकार करा सके। यहां तक कि अकबर ने नाराजगी में मानसिंह और आसफ खां से मिलना तक बंद कर दिया था। इस युद्ध में स्थान, समय, तरीका और आक्रमण की शुरुआत जैसे तमाम फैसले महाराणा प्रताप के नियंत्रण में थे। उन्होंने युद्ध को मैदान से पहाड़ों की ओर मोड़ दिया। शत्रु पर पूर्ण प्रभाव बनाए रखने के कारण इस युद्ध में प्रताप को ही विजयी कहा जा सकता है।

  • सुशीला शक्तावत, एचओडी, इतिहास विभाग, जेएनवीयू, जोधपुर

युद्ध के बाद जमीनें दान की थीं महाराणा प्रताप ने

हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की विजय हुई थी। इस युद्ध के प्रत्यक्ष दृष्टा मुगल इतिहासकार बदायूनी ने लिखा था कि मुगल सेना युद्ध स्थल से 16 किलोमीटर दूर भाग गई थी। गोगुंदा में मुगलों का आत्मविश्वास इस तरह गिरा हुआ था कि प्रताप के आक्रमण के डर से पूरी रात सेना अलर्ट पर रहती थी। अकबर का अपने सेनापतियों मानसिंह और आसफ खां की 'ड्योढ़ी बंद' करना और स्वयं युद्ध के लिए मेवाड़ प्रस्थान करना ही मुगलों की पराजय का सबसे बड़ा संकेत है। प्रताप की प्रशासनिक संप्रभुता का सबसे ठोस प्रमाण युद्ध के ठीक बाद (1576-77 ई.) जारी ताम्रपत्र हैं। उन्होंने युद्ध क्षेत्र के निकट बलीचा और लोहा सिंह जैसे गांवों में भूमि दान की और भूमि सुधार संबंधी प्रशासनिक आदेश जारी किए। इन ताम्रपत्रों पर 'एकलिंगनाथ के दीवान' के रूप में महाराणा के हस्ताक्षर अंकित थे, जो उनके मजबूत प्रशासनिक नियंत्रण को सिद्ध करते हैं।

  • दिग्विजय भटनागर, प्रमुख इतिहास विभाग, सुखाड़िया विवि

खुद मुगल इतिहास उगलते हैं सच

हल्दीघाटी युद्ध में रणनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति और शासक का सुरक्षित रहना ही जीत का मापदंड था। इस आधार पर महाराणा प्रताप विजयी रहे, क्योंकि अकबर का उद्देश्य प्रताप को बंदी बनाना या मेवाड़ को झुकाना था, जिसमें मुगल सेना विफल रही। प्रताप की विजय के सबसे ठोस प्रमाण स्वयं मुगल इतिहास से मिलते हैं। फारसी इतिहासकार बदायूनी की पुस्तक 'मुंतखब-उत-तवारीख' के अनुसार युद्ध के बाद मार्ग में किसी ने भी मुगलों की जीत पर भरोसा नहीं किया। स्वयं अकबर ने मानसिंह के विजय संदेश को नकारते हुए वास्तविक स्थिति जानने के लिए महमूद खां को मेवाड़ भेजा और बाद में मानसिंह व आसफ खां की 'ड्योढ़ी बंद' कर दी, जो मुगलों की हार का अकाट्य प्रमाण है। इसके अतिरिक्त, 'राजप्रशस्ति' जैसे स्थानीय ग्रंथ भी प्रताप की जीत की पुष्टि करते हैं। युद्ध के बाद मुगलों का अपनी हार का बदला लेने के लिए तड़पना यह सिद्ध करता है कि इस संघर्ष ने मुगलों के अजेय होने के भ्रम को हमेशा के लिए ध्वस्त कर दिया।

  • डॉ. जेके ओझा, इतिहासकार

मुगलों को चबवाए थे लोहे के चने

हल्दीघाटी के युद्ध ने साबित कर दिया कि मुगलों के लिए प्रताप को जीतना और पर्वतीय प्रदेशों पर अधिकार करना लोहे के चने चबाने जैसा था। मुगल सेना की विफलता के कारण स्वयं अकबर को मेवाड़ आना पड़ा और सैन्य अभियानों की झड़ी लग गई। इस युद्ध से मुगलों की अजेयता का मिथक टूट गया, जिसने मेवाड़ी सेना का आत्मविश्वास बढ़ाया। युद्ध के बाद प्रताप का कुम्भलगढ़ के बजाय आवारगढ़ जाना उनकी दीर्घकालीन रणनीति का हिस्सा था। उनकी नीति का मुख्य ध्येय 'शाका' करना नहीं, बल्कि निरंतर युद्ध लड़ना था।

  • मनीष श्रीमाली, असिस्टेंट प्रोफेसर, इतिहास, सुखाड़िया विवि