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Maharana Pratap Jayanti : पाकिस्तान तक पहुंचा था ‘महाराणा’ का नाम, कराची में बसी थी ‘प्रताप’ के नाम की बस्ती

Maharana Pratap Jayanti महाराणा प्रताप ने जिस वीरता, स्वाभिमान और त्यागमय जीवन को वरण किया, उसी ने उन्हें एक महानायक की छवि प्रदान की। महाराणा प्रताप राष्ट्रीय इतिहास में वीरता व स्वाभिमान के पर्याय हैं। मेवाड़ की धरती और यहां का कण-कण उनकी वीरता की कहानियां स्वत: कहते हैं। प्रताप के स्वाभिमान, वीरता व त्याग का प्रताप इतना है कि केवल हमारे देश में ही नहीं, वरन पड़ोसी देशों व अन्य देशों में भी प्रताप के नाम का डंका बजता आया है।
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उदयपुर

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Madhulika Singh

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Updated: 2 Jun 2022, 3:28 PM IST

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Maharana Pratap Jayanti 2022

मधुलिका सिंह/उदयपुर . महाराणा प्रताप केवल मेवाड़, राजस्थान या देश के ही महानायक नहीं थे, बल्कि विदेशों में भी महाराणा प्रताप के नाम का डंका आज तक बजता है। ये बहुत कम लोगों को पता है कि पाकिस्तान तक महाराणा का नाम पहुंच चुका था। इतिहासकार श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार, सन 1903 में पाकिस्तान के कराची शहर में प्रताप के नाम की पहली बस्ती बसाई गई थी। वहां से पलायन कर जो लोग उदयपुर आए। उन शरणार्थियों को प्रतापनगर में कैंप में रखा गया था। यह सिंधियों के लिए पहला कैंप था। फिर इसी जगह को भी प्रतापनगर नाम दे दिया गया और इसके बाद राणा प्रतापनगर रेलवे स्टेशन भी प्रताप के नाम पर रखा गया। इसके अलावा कराची में जो महान योद्धाओं के उस समय रंगीन पोस्टर छपे थे, उसमें 5 वीरों के चित्र में महाराणा प्रताप भी शामिल थे।लाहौर के काव्य संग्रह में प्रताप के चर्चे

श्रीकृष्ण जुगनू ने बताया कि कराची के अलावा पाकिस्तान के ही लाहौर शहर तक भी प्रताप के चर्चे रहे हैं। यहां के पुष्पांजलि काव्य संग्रह में प्रताप पर कविताएं थीं। इसके अलावा इस संग्रह में महाराणा सज्जनसिंह पर भी कविताएं हैं। ये साबित करता है कि वहां रहने वाले भी प्रताप के शौर्य और वीरता से परिचित थे।

इन देशों में भी प्रताप का डंका -

- मॉरिशस में महाराणा प्रताप के मूर्ति लगी है। वहां गहलोत सभा के नाम से भारतीयों का बड़ा संगठन है। राजधानी पोर्ट लुई में घुड़दौड़ मनोरंजन का साधन है। वहां कई प्रवासी भारतीय निवास करते हैं। इसमें जो घोड़ा सफल होता है, उसे सभी प्रवासी भारतीय ‘चेतक’ के नाम से पुकारते हैं। वहीं, दक्षिण मॉरिशस में ‘प्रताप बैठका’ की मान्यताएं है, जहां सभी लोग बैठकर आपसी चर्चाएं करते हैं, इसलिए उसका नाम ‘प्रताप बैठका’ रखा है।

- माल्टा सरकार महाराणा प्रताप पर चांदी का सिक्का जारी कर चुकी है। यह सिक्का वर्ष 2004 में माल्टा सरकार ने जारी किया था। यह चांदी का सिक्का .999 चांदी का है। इसका वजन 1 किलो है। माल्टा सरकार ने कुल 100 सिक्के जारी किए थे। सिक्के के एक ओर महाराणा प्रताप का चित्र बना हुआ है और 1540-1597 लिखा हुआ है, जबकि दूसरी ओर माल्टा देश का चिह्न व देश का नाम वहां की भाषा में लिखा हुआ है। साथ ही इस सिक्के का भार भी लिखा गया है।

-सूरीनाम दक्षिण अमरीका में आज भी दानदाता को वहां के प्रवासी भारतीय भामाशाह’ कहकर पुकारते हैं।

-त्रिनिडाड टोबेगो में सन 1985 ईस्वी में वहां हुए ‘भारत की झांकी’ कार्यक्रम में प्रताप का तैलचित्र रखा गया था। वहां के भारतीय विद्या संस्थान में मीरां बाई व महाराणा प्रताप का चित्र संग्रहित है।

-फिजी में भारतीयों की संख्या काफी है। वहां का प्रसिद्ध कवि जो दूबू का रहने वाला है, वो अपनी रचनाओं में अपने नाम की जगह ‘प्रताप’ ही लिखता है।- महाराणा प्रताप पर विश्व की 65 भाषाओं में विवरण लिखे गए हैं।

राशमी में बना प्रतापेश्वर, जहां पेड़ काटने पर लगता था 300 रुपए जुर्माना

डॉ. जुगनू ने बताया कि उदयपुर का जो स्वरूप रहा है वो महाराणा प्रताप की देन है। प्रताप ने पानी, पर्यावरण और पहाड़ बचाने का मंत्र दिया। वे चाहते थे कि उदयपुर को बाडि़यों के रूप में बसाया जाए। उदयपुर में 90 बाडि़यां हैं। इन बाडि़यों में तोतों की नस्लें लंबे समय से फल-फूल रही है। दूसरा, उदयपुर को जल के आधार के रूप में बसाने का श्रेय भी प्रताप को है। पुस्तक राज रत्नाकर में कहा गया है कि इस नगर पर उनका व्यक्तिगत ध्यान था। प्रताप चाहते थे कि यहां प्राकृतिक कुंडों का ध्यान रखा जाए। प्रताप के बाद महाराणा जयसिंह तक मेवाड़ में सौ जलाशय बन गए। इनमेें सबसे सुंदर जलाशय जयसमंद में बना। इस बात का भी पुस्तक विश्ववल्लभ में उल्लेख है। इसी तरह पर्यावरण बचाने का भी संदेश उनका ही था। चित्तौड़गढ़ के राशमी में महाराणा अमरसिंह ने प्रतापेश्वर के नाम से शिवालय बनवाया और पूरे गांव को पुण्य क्षेत्र घोषित किया। इस संरक्षित क्षेत्र के वनों से कोई पेड़ नहीं काट सकता था, क्योंकि आर्थिक सजा 300 रुपए थी और उस दौर में एक विवाह भी सामान्यत: 50 से 75 रुपए तक में संपन्न हो जाता था। ऐसे में यहां कभी कोई पेड़ नहीं काटा जा सका। इस बात का उल्लेख कर्नल जेम्स टॉड की पुस्तक एनाल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान में है।