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पाकिस्तान से लाई गई ईंटों से बसा दिया था गांव! अब ईंट से ईंट बजाने को भारतीय सेना के साथ हैं तैयार

लोग अपने साथ गडरा सिटी के राधा कृष्ण मंदिर की मूर्तियां भी ले आए थे...

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- सुरेश व्यास


बाड़मेर।

पश्चिम में भारत-पाकिस्तान सीमा के आखिरी गांव गडरा रोड का हर नागरिक किसी फौजी से कम नहीं है। पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 की जंग में भी गांव के लोगों ने सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। चाहे सेना को पाकिस्तान की ओर के रास्ते बताने का काम हो या सेना के लिए राशन-पानी का इंतजाम, इस गांव के लोग युद्ध समाप्त होने तक सेना के साथ डटे रहे थे। आज जब सीमा पर तनाव का माहौल है तो गांव के लोग जंग से खौफ की बजाय फिर मौका मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

पाकिस्तान से सटी अन्तरराष्ट्रीय सीमा से महज डेढ़-दो किलोमीटर दूरी पर है गडरा रोड। यहां बीएसएफ की अग्रिम चौकी है। सामने है पाकिस्तान का गडरा सिटी इलाका। गडरा सिटी इलाका यहां आकर बसे लोगों ने बंटवारे के वक्त खाली कर दिया था। यह प्राचीन भारत का प्रमुख वाणिज्यक रूट था। और यहां बसे लोग आर्थिक दृष्टि से काफी सक्षम व्यापारी थे। बंटवारे से पहले बिगड़े माहौल में ये लोग भारत की ओर चले आए। आते वक्त वहां ईंट तक नहीं छोड़ी। एक तरह से यह पूरी तरह से विस्थापितों का बसाया हुआ गांव है। पुलवामा हमले के बाद सीमा पर तनाव के बीच लोग डरकर नहीं, इस जज्बे के साथ तैयारी कर रहे हैं कि उन्हें एक बार फिर पाकिस्तान को सबक सिखाने का मौका मिलेगा।

घर भी साथ लाई ईंटों से बनाए
सेवानिवृत्त स्कूल प्रिंसिपल रवि शंकर वासु बताते हैं कि पाकिस्तान से लाई गई ईंटों से ही गडरा रोड बसाया गया। ऐसी कुछ ईंटें आज भी गांव के पुराने घरों में देखी जा सकती है। वासु कहते हैं कि 1965 व 1971 की जंग में भी बड़ी संख्या में बंटवारे के वक्त पाकिस्तान में रह गए लोग यहां आ बसे। आज यहां लगभग 10 हजार की आबादी है। 1971 की जंग में भी यहां के लोगों में भय नहीं था और आज भी नहीं है।

टोकरे भरकर पहुंचाया खाना
गांव के नंदलाल लोढ़ा के मुताबिक 1965 और 1971 की लड़ाई यहां के लोगों ने नजदीक से देखी है। आज भी लोगों में पाकिस्तान की ईंट से ईंट बजा देने का जज्बा है। दोनों ही लड़ाइयों में लोगों ने घर घर खाना बनाकर सेना को पहुंचाया था। 1971 की लड़ाई में हर घर से टोकरों में भरकर खाना सेना तक पहुंचाया गया और सेना की टुकड़ी ने यहां से मूव करके छाछरो तक जंग फतह की थी। लोग आज ऐसे ही एक और मौके का इंतजार कर रहे हैं।

रेल कर्मियों ने दी शहादत
गडरा रोड रेलवे कर्मियों की शहादत के लिए भी प्रसिद्ध है। सम्भवत: पहला मौका था जब रेल कर्मियों ने फौज की मदद के लिए 1965 की जंग के दौरान प्राणोत्सर्ग किया। शहीद हुए 17 रेल कर्मियों की याद में यहां शहीद स्मारक बना है। हर साल 9 सितम्बर को मेला भरता है। शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।

मूर्तियां भी साथ लाए
लोग अपने साथ गडरा सिटी के राधा कृष्ण मंदिर की मूर्तियां भी ले आए थे। इन्हें गांव में भव्य ढाट कान्हा मंदिर में प्रतिष्ठापित किया गया। आज भी यहां मंदिर के आयोजनों में देश में अन्यत्र जाकर बस गए गडरा सिटी के माहेश्वरी समाज के लोग शामिल होने आते हैं।

मिठास भी नहीं छोड़ी
1965 की लड़ाई के दौरान पाकिस्तान की गडरा सिटी से हलवाई अमोलकदास भूतड़ा के परिवार ने पलायन किया। इसके साथ वे पाकिस्तान की मिठास भी ले आए। गडरा के प्रसिद्ध लड्डू अब भारत में बनते हैं और फौज के कारण देश भर में मिठास फैला रहे हैं।

अटल जी भी आ डटे थे
1971 की लड़ाई के दौरान बड़ी संख्या में आए शरणार्थियों को वापस खदेडऩे के मुद्दे पर गडरा में बवाल भी हुआ। उस वक्त विपक्ष के बड़े नेता के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी व जनसंघ के कई अन्य नेता गडरा रोड पहुंचे। यहां तीन दिनों से ज्यादा दिनों तक डेरा डाले रखा। शरणार्थियों को वापस भेजने का विरोध किया। गांव के कोजराज माहेश्वरी के घर में अटल बिहारी वाजपेयी रुके थे। ये घर आज भी उनकी स्मृतियों का केंद्र है।

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