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तीन पीढिय़ा जुटती है एक साथ, तब होती है परिवार में दिवाली रोशन

-माटी के दीपक बनाने में पिता, पुत्र, पोता सभी जुटे -घर की बेटियां भी नहीं है पीछे, पूरा कर रही है सहयोग

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तीन पीढिय़ा जुटती है एक साथ, तब होती है परिवार में दिवाली रोशन

तीन पीढिय़ा जुटती है एक साथ, तब होती है परिवार में दिवाली रोशन

बाड़मेर. माटी की महक और दिवाली की खुशियां घरों में रोशन करने के लिए बाड़मेर के बलदेव नगर में तीन पीढिय़ां एक साथ दीपक बनाने में जुटी हुई है। सुबह से लेकर देर शाम तक चॉक पर माटी के दीपक बनाने में मानो पूरा परिवार ही लग रहता है। दिवाली नजदीक आने के साथ चॉक की गति भी तेज हो गई है।
पीढिय़ों से माटी को आकार देने का काम करने वाले परिवारों को भी दीपावली के दीपक बनाने का बेसब्री से इंतजार रहता है। दीपक दिखने में भले ही छोटा हो, लेकिन इसमें कई लोगों की मेहनत लगती है, तब जाकर कहीं एक दीया आकार लेता है।
आसान हो गया है दीपक बनाना
समय के साथ चॉक भी बदल चुकी है। अब बार-बार हाथ से घुमाने की जरूरत नही हैं। जुगाड़ करते हुए अब चॉक को इलेक्ट्रिक मोटर से जोड़ दिया गया है। जिससे चॉक अब जरूरत अनुसार एक निश्चित गति पर चलती रहती है।
पहली पीढ़ी...पिता लालाराम
माटी को दीपक का आकार देने में तीन पीढिय़ां एक साथ लगी रहती है। पिता लालाराम बुजुर्ग हैं, लेकिन हाथों की कारीगरी का कोई जवाब नहीं है। बड़ी चॉक पर दीपक इतनी तेजी और सलीके से बनाते हैं कलाकारी साफ झलकती है।
दूसरी पीढ़ी...बेटा पीराराम
एक मिनट में 150 से अधिक दीपक बनाने का हुनर रखते हैं पीराराम। सालों से पिता से सीखी माटी को आकर देने की कला आज उनके जीवनयापन का साधन बनी हुई है। दिवाली पर दीपक की अधिक बिक्री की उम्मीद में उनकी यह गति और भी बढ़ जाती है।
तीसरी पीढ़ी...पोता हुक्माराम
पढाई के साथ परिवार की कला को आगे ले जाने में पोता हुक्माराम भी पीछे नहीं है। 10वीं में पढऩे वाले बच्चे ने दादा-पिता से कला को सीखा और अध्ययन के साथ परिवार के लिए आर्थिक सहयोग में भी भागीदारी निभा रहा है।
बेटी...संगीता...यह पीढ़ी एक नहीं दो घरों को करेंगी रोशन
पीराराम की बेटी संगीता 7वीं कक्षा में पढ़ती है। माटी के दीपक बनाने में वह भी पूरी तरह पारंगत है। पढाई के बाद अभी दिवाली के दौरान वह भी दीपक बनाने में पूरी तरह से जुटी है। वह बताती है कि यह कला हमारे परिवार की पहचान है।
मोकलसर से लाते है माटी
पीराराम बताते हैं कि दीपक बनाने के लिए माटी बाड़मेर के आसपास नहीं मिलती है। इसलिए मोकलसर से माटी लेकर आते हैं। वहां उनकी खुद की जमीन है, जहां से मिट्टी खोदकर ट्रक में भरकर यहां लाते हैं। मोकलसर की मिट्टी अच्छी मानी जाती है।

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