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जिला मुख्यालय बाड़मेर से 180 किमी दूर स्थित पुलिस थाना मंडली का एक दशक से किसी भी पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी ने निरीक्षण नहीं किया है।
थाने में जाने की बात दूर पुलिस अधिकारी इसके क्षेत्र में जाने से कतराते हंैं। किंवदंती है कि इससे पूर्व किसी अधिकारी ने थाने का निरीक्षण किया तो उसका तबादला हो गया या उसे अचानक ही जिला छोडऩा पड़ा।
यह है वजह
ग्रामीणों के अनुसार दशकों पहले भोलानाथ नाम का एक साधु थाना परिसर में रहता था। गांव की सीमित आबादी के कारण ग्रामीणों के साथ थानाधिकारी व जवान भी साधु की सेवा-चाकरी करते थे। इस दौरान किसी थानाधिकारी के परिवार में मौत हो गई। पुलिस अधीक्षक ने उसकी कहीं दूसरी जगह ड्यूटी लगा रखी थी।
उसके अवकाश मांगने पर पुलिस अधीक्षक ने स्वीकृति से मना कर दिया। साधु के मायूस थानाधिकारी से कारण पूछने पर उसने पूरी बात बताई। नाराज साधु ने पुलिस अधिकारियों को श्राप देते हुए कहा कि आई जको जाय...।
इसके बाद पुलिस अधिकारी भी इस थाने में नहीं आते हैं, जबकि पुलिस अधिकारियों को सालाना प्रत्येक पुलिस थाने का भौतिक व रिकॉर्ड निरीक्षण करना होता है। साधु के श्राप के बाद थानाधिकारी की कुर्सी पर भी किसी ने बैठने की हिम्मत नहीं की।
थाने में दूसरे कमरे का निर्माण करवाया गया, जिसमें थानाधिकारी बैठते हैं। पुराने कमरे व टेबल-कुर्सी की हर दिन पुलिस कार्मिक साफ-सफाई करते हैं। थाने के पास बाबा की समाधि पर ग्रामीणों ने मंदिर, छतरी व धूणे का निर्माण करवा दिया जहां ग्रामीण, पुलिस जवान व अधिकारी भी मन्नत मांगने जाते हैं।
14 साल पहले गांव में आए थे कलक्टर-एसपी
ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2003 में लोकसभा चुनावों के समय तत्कालीन कलक्टर व एसपी ग्रामीणों को ईवीएम की जानकारी देने आए थे। तब भी वे थाने की चारदीवारी के अंदर नहीं गए थे।
मैनें कई वर्षों से थाने में किसी पुलिस अधिकारी को नहीं देखा है। कई साल पहले एक पुलिस अधीक्षक आए थे, वापस रवाना होने से पहले ही उनका तबादला आदेश आ गया था। - सुमेरमल जैन, ग्रामीण
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