1 फ़रवरी 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बाड़मेर के प्रताप को मिला था अशोक चक्र, बमबारी के बीच भी नहीं रोकी रेल

https://www.patrika.com/barmer-news/

2 min read
Google source verification
Pratap had met Ashok Chakra, not even in the middle of the bombardment

Pratap had met Ashok Chakra, not even in the middle of the bombardment

पराक्रम-1965 : जवानों के लिए रसद पहुंचाने का मिला था जिम्मा, अदम्य साहस के साथ पहुंचाया गंतव्य तक
बाड़मेर के प्रताप को मिला था अशोक चक्र, बमबारी के बीच भी नहीं रोकी रेल
भारत पाकिस्तान के बीच जब बात जंग की आती है तो सेना के साथ कंधा से कंधा मिलाकर एेसे लोग भी खड़े हुए हैं जो देश को प्रथम मानते रहे हैं। बाड़मेर के एेसे ही रेल चालक रहे प्रतापचंद जिनके अदम्य साहस और बाहादुरी के लिए उन्हें अशोक चक्र से नवाजा गया।
ओम माली

बाड़मेर. रेलवे के एक चालक को अशोक चक्र.. है न अचंभित। देश में यह इकलौता चालक रहा है, जिन्हें यह गौरव मिला है। मिले भी क्यों नहीं, जब 1965 के युद्ध में पाकिस्तान बमबारी कर रहा था तो बाड़मेर का प्रतापा जान की परवाह किए बिना रेल को लेकर बॉर्डर की ओर बढ़ रहा था। बमबारी के बीच चलती रेल किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं थी। प्रतापा को सेना को राशन पहुंचाना था और जख्मी होकर भी वह मुनाबाव बॉर्डर तक पहुंचे। युद्ध के बाद प्रतापा के सीने पर भारत के राष्ट्रपति रहे सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अशोक चक्र लगाया तो भारतीय रेल को गौरव हुआ। 9 सितंबर 1965 की यह घटना है। रेलवे हर साल गडरारोड़ के पास शहीद दिवस मनाता है। प्रतापा के रेलवे के 17 साथियों ने इस रेल को बॉर्डर तक पहुुंचाने के लिए जान दी थी, जिनको हर साल रेलवे याद करती है।
भारत-पाक युद्ध 1965 में के दौरान बाड़मेर रेलवे स्टेशन पर सूचना आई कि सेना के लिए रसद सामग्री की एक ट्रेन गडरारोड ले जानी है। इस काम के लिए एक साहसिक चालक की जरूरत थी। तभी चालक (1416) प्रतापचंद आगे आए और बोले कि यह काम करेंगे। ट्रेन को रात में ही ले जाना था। ट्रेन में खाद्य सामग्री भरकर रात में ही रवाना हो गए। बीच में पटरी भी क्षतिग्रस्त थी।
पूरी ट्रेन को उस पटरी से ले जाना संभव नहीं था। उन्होंने सूझबूझ दिखाते हुए रेल के खाली डिब्बे स्टेशन पर छोड़ दिए और खाद्य सामग्री से भरे कोच लेकर रवाना हो गए। दोनों तरफ गोलीबारी हो रही थी। गोलीबारी के दौरान एक छर्रा प्रतापचंद को लगा। लहूलुहान हो गए, लेकिन ट्रेन की रफ्तार को कम नहीं किया। घायल प्रतापा ने सैनिकों को रसद सामग्री पहुंचा कर ही सांस ली।
पिता की बहादुरी पर गर्व
हमारे पिता पर हमें ही नहीं पूरे देश को गर्व है। उन्होंने युद्ध के दौरान जवानों के लिए रसद सामग्री पहुंचाकर अदम्य साहस दिखाया। जिसके कारण उन्हें प्रशंसा पत्र और अशोक चक्र मिला था। जब भी अशोक चक्र देखता हूं तो उनकी बहादुरी से मेरा सीना भी चौड़ा हो जाता है।
-मेवाराम (प्रतापचंद के पुत्र)

Story Loader