
बाड़मेर/गडरारोड।
60 साल की धीया देवी, 12 साल की उम्र में ही ब्याह दी गई। ससुराल सीमा का आखिरी गांव अकली। शादी के पहले ही दिन से ही उसके सिर पर एक घड़ा रख बेरियों से प्रतिदिन सुबह-शाम पानी लाने का जिम्मा सौंप दिया गया। वह पांच से दस घड़े पानी रोज मीलों सफर कर लाती है। पिछले 48 साल से यह काम उसकी जिन्दगी का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है। बॉर्डर के आखिरी गांव की यह महिला रूंधे हुए गले से कहती है क्या मेरे जीते जी ट्यूबवेल लगेगा..? धीयादेवी ही नहीं इस गांव की 300 घरों की बस्ती की हर महिला की यही सबसे बड़ी पीड़ा है। वे कहती है कि घी ढुळे तो म्हारो कुछ ना ज्यासी, पाणी ढुळे तो म्हारो जी बळ जासी...। यानि यहां देसी घी से ज्यादा पानी महत्व रखता है। परिवार के लिए पानी लाने का जिम्मा घर की छोटी-बड़ी महिलाओं के सिर पर है।
राज नहीं हमें तो पीने का पानी चाहिए
इन महिलाओं का कहना है कि हमें राज नहीं चाहिए। न ही हमें और कुछ चाहिए। इस आखिरी गांव में पानी के लिए एक ट्यूबवेल दे दिया जाए तो खूब है। वे कहती हैं कि हमने तो महिलाओं का राज भी देख लिया लेकिन यहां कौन आएगा...कोई नहीं आता?
सिर के बाल नहीं बचे
साठ वर्ष की उम्र हो चुकी है। अब तक हजारों घड़े पानी उठा चुकी हूं। सिर के बाल भी नहीं रहे। सबसे बड़ी चिंता इन मासूमों के लिए है कि इनकी जिंदगी भी पानी भरने में जा रही है।
- धीया देवी, उम्र साठ वर्ष
ट्यूबवेल लग जाए
बीस लीटर का घड़ा उठाए रेतीले टीलों के बीच दिनभर चलना नियति बन गई है। सरकारी हौदी व ट्यूबवेल हो जाए तो पानी खींचने से छुटकारा मिल जाए।
निर्मला देवी, गृहिणी
Published on:
22 Feb 2019 10:30 am
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