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बाड़मेर का देसी स्वाद… बेमिसाल और लजीज, फाइव स्टार होटलों के खाने को देता मात

बीते दिनों बड़े अनाज वर्ष को लेकर संसद में आयोजन हुआ तो बाड़मेरी बाजरे की रोटी का स्वाद प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति सहित देश के सभी सांसदों ने भी चखा।

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Rajasthan News: हर इलाके का अपना स्वाद होता है और व्यंजनों की अलग पहचान। बाड़मेर में भी स्वाद का खजाना अलग ही है। वार-त्यौहार ही नहीं। आम दिनों में भी जब बाड़मेरी खाना परोसा जाता है तो लोग अंगुलियां चाटते रह जाते हैं। देसी खाने की मांग मुख्य पर्व पर भी रहती है।

बाजरी का सोगरा

बाजरा बाड़मेर-जैसलमेर का प्रमुख खाद्य अनाज हैै। बाजरे की रोटी घर-घर बनती है। देसी बाजरा यहां खेतों में उपजता है। आज भी लोग चूल्हे पर यह रोटी बनाकर सेकते है और इसके साथ में केर, सांगरी, दही का रायता, कुम्मट की सब्जी, प्याज के साथ परोसा जाता हैै। बाजरे की रोटी के साथ मक्खन, दही,घी परोसने का रिवाज है। गुड़ के साथ मिले तो किसी पकवान से कम नहीं। सुबह प्याज और छाछ के साथ ठण्डी रोटी का स्वाद यहां की पसंद है।

ढाबे पहली पसंद- बाजरी का सोगरा खाने के शौकीनों को ढाबे पर बाजरे की रोटी खूब मिलती है। हाईवे और शहर में ऐसे ढाबों पर देसी-विदेशी पर्यटकों की भी भीड़ लगी रहती है।

हाइटेक हुआ- जैसलमेर के पांच सितारा होटल से लेकर अब तो शादी-ब्याह और बड़ी पार्टी में बाजरी की रोटी की डिमांड अलग से होने लगी है।

प्रधानमंत्री सहित संसद ने चखा- बीते दिनों बड़े अनाज वर्ष को लेकर संसद में आयोजन हुआ तो बाड़मेरी बाजरे की रोटी का स्वाद प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति सहित देश के सभी सांसदों ने भी चखा।

केर-सांगरी-कुम्मट

केर-सांगरी-कुम्मट…तीनों ही रेगिस्तान की ऐसी वनस्पति के उत्पाद है जो अकाल और कम पानी में जिंदा रहने वाले पेड़, झाडियों से उपजे है। सांगरी राज्यवृक्ष खेजड़ी, केर यहां की मुख्य झाड़ी और कुम्मट का पेड़ है। तीनों की फल यहां सब्जियों में काम में आते हैै। इनकी कीमत सुनकर दंग रह जाएंगे। ये सुखाकर सब्जी को तैयार होते हैै तो हजार से दो हजार रुपए किलोग्राम में बिकते है। इनकी स्वादिष्ट सब्जी की दीवानगी हद से पार है।

फाइव स्टार की स्टार
केर-सांगरी और कुम्मट अब फाइव स्टार होटल तक पहुंच गए हैं। जहां इनकी सब्जी की कीमत काजूकरी और मलाईकोफ्ता को मात देती है।

काजू आते हैं, केर सांगरी जाती हैं
रेगिस्तान के इस इलाके में संभाळ यानि गिफ्ट भेजने का रिवाज है। महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों में प्रवासी बसे हुए है। वे काजू, किसमिस, बादाम और मसाले भेजते हैं और बदले में चाहते हैं कि केर, सांगरी, कुम्मट आ जाए।

बाड़मेर का संधाणा..सेहत का खजाना

सर्दियों में बाड़मेरी संधाणे के लड्डू जिसने तीन महीने खा लिए चार महीने के लिए रिचार्ज। बुजुर्गों के लिए तो रामबाण दवा है। आयुर्वेद भी इसकी पूरी सलाह देता है। हड्डियों की मजबूती और सेहत का खजाना है। मैथी के इन लड्डुओं में देसी घी, गोंद, आयुर्वेदिक जड़ी-बूूटियां और अन्य उत्पाद मिलाकर बनाया जाता है, जिनका सेवन सुबह-सुबह किया जाता है। इन संधाणे के लड्डू को लगभग हर घर में बुजुर्गों की सेहत के ख्याल के लिए बनाते हैैं। महिलाओं व बच्चों के लिए उड़द और सूंठ के लड्डू बनते हैं।

सुन्दरा का भाद्रपद का घी

कल्पना कीजिए जिस रेगिस्तान में पानी की कमी रही वहां घी की नदियां। यह अकल्पनीय सत्य जुड़ा है बॉर्डर के इलाके से। बॉर्डर के सुन्दरा से लेकर हरसाणी गिराब और जैसलमेर के रामगढ़ तक के इलाके में गायों की संख्या बहुतायत में रही है। यहां बारिश के बाद सेवण और देसी घास पैदा होती है। इस घास को खाने के बाद सावन और भाद्रपद में जो घी तैयार होता है वह सबसे गुणकारी माना जाता है। भाद्रपद का यह घी बेचने के लिए मुश्किल से मिलता हैै।

कोटड़ा की मिश्री रोटी

शिव का कोटड़ा गांव ऐतिहासिक है। यहां पुराना किला था,जो अब जीर्ण है। यहां की मिश्री रोटी (साकर रोटी) का स्वाद अलग ही है। आटा, मिश्री की शक्कर के मिश्रण को धीमी आंच पर पकाने और इसको डिजाइन कर बनाने की कला यहां की गृहणियों की खासियत में हैं।

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