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सरकार ने योजना बनाकर मजदूरों को बीमारी से बचाने के लिए फंड तैयार किया, लेकिन अफसरशाही मजदूरों की जान से खेल रही है। इसे घोर लापरवाही ही कहेंगे की जानलेवा बीमारी से ग्रसित मजदूर को सरकारी योजना के तहत प्रमाणित कर दिया जाता है, लेकिन सालभर तक उन्हें अनुग्रह राशि नहीं मिल पाती और उसकी मौत हो जाती है। मामला है सिसिकोसिस का। सीमावर्ती बाड़मेर जिले में प्रमाणित होने के बाद चार मजदूरों की मौत महज इस कारण हो गई कि उन्हें समय पर अनुग्रह राशि नहीं मिली।
राजस्थान पर्यावरण एवं स्वास्थ्य बोर्ड ने 11 फरवरी 2013 को निर्णय लिया कि सिलिकोसिस से पीडि़त श्रमिकों को एक-एक लाख रुपए की राशि तथा सिलिकोसिस के कारण मृत्यु होने पर श्रमिक के विधिक उत्तराधिकारी को 3 लाख रुपए की सहायता दी जाएगी। जिले में दो वर्ष तक इन पीडि़तों की मदद के लिए बजट के अभाव में कोई खास कार्य नहीं हुआ।
मजदूर संगठनों की पैरवी के बाद 2015-16 में सिलिकोसिस मरीजों की जांच व सत्यापन के लिए विशेषज्ञ चिकित्सकों व रेडियोग्राफर की 3 सदस्यीय जिला कमेटी का गठन किया गया। कमेटी के सदस्यों के अनुसार अब तक जिले में करीब 34 मरीजों को प्रमाणित किया गया है।
प्रक्रिया में अटकी सहायता
कमेटी की आेर से प्रमाणित किए जाने वाले श्रमिकों ने सहायता के लिए जब प्रशासन के समक्ष आवेदन किया तो उन्हें मेडिकल कॉलेज जोधपुर के प्राचार्य या मथुरादास माथुर अस्पताल के अधीक्षक से सत्यापन करने को कहा गया। कई महीनों तक सरकारी प्रक्रिया में चलने के बाद इसके सत्यापन को इस योग्य माना गया। सरकार की तरफ से 29 जून 2015 को 10 सिलिकोसिस मरीजों को आर्थिक सहायता के तौर पर एक-एक लाख रुपए की आर्थिक सहायता के आदेश हुए।
सैकड़ों मजदूर बीमार
वर्ष 2012-13 में राजस्थान एनवायरमेंट एंड हेल्थ एडमिनिस्ट्रेशन बोर्ड के तहत राजस्थान एनवायरमेंट एंड हेल्थ सेस फंड बनाया गया। पिछले चार वर्षों में इस बीमारी से पीडि़त लोगों की सहायता के लिए करीब 5 करोड़ रुपए से अधिक इस फंड में एकत्र किया। राज्य सरकार ने फंड के आवेदन के लिए जिला कलक्टर को नोडल ऑफिसर नियुक्त किया है। जिले में सैकड़ों की संख्या में लोग इस बीमारी की चपेट में है, लेकिन अधिकतर लोगों को इसकी जानकारी नहीं है।
केस 1
शहर के जटियों का मोहल्ला निवासी किशनलाल पुत्र चुतराराम को 23 मार्च 2015 को प्रमाणित किया गया। उसकी मदद के इंतजार में 22 जून 2015 में मौत हो गई। चार बच्चों के साथ किशनलाल की पत्नी गीता अभावों की जिन्दगी जी रही है। छोटे से कच्चे मकान में रहकर अपने लोगों के घर में काम कर परिवार का पालन पोषण कर रही है। इन्हें कोई सहायता राशि नहीं मिली है।
केस 2
जोगियों की दड़ी निवासी मंगलाराम पुत्र आसूराम को 27 मार्च 2015 को प्रमाणित किया। उसकी 27 मई 2015 में इस बीमारी से मौत हो गई। आसूराम के परिवार को सिलोकोसिस को लेकर कोई सहायता राशि नहीं मिली है।
केस 3
जटियों के मोहल्ले में रहने वाले राजेन्द्र पुत्र लेखराज को कमेटी की ओर से 11 मई 2015 को प्रमाणित किया गया। उसकी करीब 9 माह बाद 6 फरवरी 2016 को मौत हो गई। राजेन्द्र के परिवार को सिलिकोसिस बीमारी को लेकर कोई सहायता नहीं मिली।
केस 4
जोगियों की दड़ी निवासी भीखाराम पुत्र सरदाराराम को 16 मार्च 2015 में प्रमाणित करने किया गया और उसे एक लाख रुपए की सहायता तो मिली, लेकिन परिवार के विधिक उत्तराधिकारी को भीखाराम की मौत के बाद अब तक 3 लाख रुपए की सहायता नहीं मिल पाई है।
परिवार पर आर्थिक संकट
पति की बीमारी से मौत के एक वर्ष बाद भी कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली है। परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा है।
गीता, मृतक किशनलाल की पत्नी
नहीं मिल रही आर्थिक मदद
जिले में हजारों लोग सिलिकोसिस की चपेट में है, लेकिन प्रशासन लापरवाह बना हुआ है। ऐसे में इस बीमारी से ग्रसित व मृतकों को आर्थिक मदद नहीं मिल रही। इससे इनके परिवारों पर आर्थिक संकट है। सिलिकोसिस से ग्रसित मरीजों को प्रतिवर्ष एक लाख रुपए की अनुग्रह राशि मिलनी चाहिए।
लक्ष्मण बडेरा, जिलाध्यक्ष, कमठा मजदूर यूनियन
प्रक्रिया में है प्रकरण
सिलिकोसिस को लेकर हम संवेदनशील हैं। प्रमाणित सभी प्रकरण प्रक्रिया में है एवं इसका निस्तारण जल्द किया जाएगा। वर्ष 2015-16 में 34 लाख रुपए की अनुग्रह राशि पीडि़तों को प्रदान की गई है।
ओमप्रकाश विश्नोई, अतिरिक्त जिला कलक्टर, बाड़मेर

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