
Sardar Sarovar Dam narmda in barwani
बड़वानी. मानसून की दस्तक होते ही प्रशासन भी डूब प्रभावित क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की तैयारियों में जुट गया है। डूब क्षेत्रों में रह रहे ग्रामीणों को आपात स्थिति में गांव से निकालकर उनके रहवास के लिए आपदा प्रबंधन का इंतजाम किया जा रहा है। नर्मदा बचाओ आंदोलन का आरोप है कि एक बार फिर डूब और आपदा प्रबंधन के नाम पर करोड़ों का खर्च किया जाएगा। आज तक आपदा प्रबंधन के नाम पर हुए खर्च का कोई लाभ डूब प्रभावितों को नहीं मिला है। आपदा प्रबंधन के नाम पर हर साल होने वाले करोड़ों के खर्च से ये भी साबित होता है कि आज भी डूब प्रभावितों का पूरा पुनर्वास नहीं हुआ है।
बाढ़ आपदा और राहत प्रबंधन के लिए हर साल 3 करोड़ का बजट प्रशासन के पास आता है। जिसमें प्रशासन द्वारा बाढ़ संभावित और डूब प्रभावित क्षेत्रों में नाव बोट का इंतजाम किया जाता है। साथ ही बाढ़ प्रभावितों के लिए परिवहन, अस्थाई शिविर, भोजन का प्रबंधन, मवेशियों के लिए शेड, चारा आदि की व्यवस्था की जाती है। नर्मदा बचाओ आंदोलन के राहुल यादव ने बताया कि बाढ़ राहत के नाम पर हर साल करोड़ों तो खर्च किए जाते हैं, लेकिन इसका कोई लाभ आज तक डूब प्रभावितों ने नहीं लिया है। वर्ष 2000 के पहले से शासन द्वारा ये प्रबंधन किया जा रहा है और एक भी विस्थापित आपदा की स्थिति में इन राहत शिविरों में नहीं गया, न प्रशासन द्वारा दिया भोजन लिया गया है।
इतने में कई परिवारों का हो जाता विस्थापन
नबआं के मुकेश भगोरिया ने बताया कि हर साल करोड़ों खर्च करने के बाद भी डूब प्रभावितों ने कोई लाभ नहीं लिया है। आज भी सरदार सरोवर बांध के 30 हजार विस्थापित डूब क्षेत्र में निवासरत हैं, जिनका पुनर्वास बाकी है। अब तक बाढ़ राहत की खर्च की राशि जोड़ी जाए तो 60 करोड़ रुपए से ज्यादा होती है। इतने में कई परिवारों का पुनर्वास हो जाता और सरकार की तिजौरी खाली नहीं होती। पिछली सरकार ने सिर्फ अपने नेताओं को फायदा पहुंचाने और अधिकारियों ने अपना घर भरने के लिए बाढ़ आपदा के नाम पर करोड़ों खर्च कर डाले।
इन गांवों में रहता बाढ़ का खतरा
बड़वानी में सरदार सरोवर बांध की डूब का लेवल 127 मीटर से शुरू होता है। वर्तमान में नर्मदा का जलस्तर 119.550 मीटर बना हुआ है। बारिश में बड़वानी जिला मुख्यालय से लगे डूब गांव हमेशा बाढ़ के खतरे में रहते हैं। इसमें प्रमुख रूप से भादल, तुअरखेड़ा, तजारा, कोटबांधनी, भोमसा, बोरखेड़ी, पुली, मोरकट्टा, बिजासन, भवती, सोनूद, पिछोड़ी, कुकरा राजघाट, भीलखेड़ा, पेंड्रा, नंदगांव, कुंडिया, कसरावद, गजनेरा, एकलरा, सनगांव, खेड़ी, अवली, सेगांवा, छोटा बड़दा, दतवाड़ा, पिरमोही, लोहारा, पानया, पिचोला, गांव हमेशा डूब में रहते हैं। यहां 9 हजार से ज्यादा परिवार अभी भी अपना बसेरा बनाए हुए हैं।
करोड़ों के टीनशेड भी हुए बेकार साबित
राहुल यादव ने बताया कि बड़वानी जिले में वर्ष 2017 में अस्थाई टीन शेड के लिए 5.23 करोड़ रुपए व्यर्थ खर्च किए गए थे। इन अस्थाई टीन शेड में एक भी परिवार रहने को नहीं गया। इसमें अंजड़ टीन शेड के लिए 1.61 करोड़, अवल्दा-सौंदुल टीन शेड के लिए 1.81 करोड़ और पाटी नाका टीन शेड के लिए 1.81 करोड़ रुपए का भुगतान भाजपा के पदाधिकारी ठेकेदारों को हुआ था। ये रुपया अगर विस्थापितों को मिल जाता तो कइयों का पुनर्वास हो जाता। दो साल बाद ये टीन शेड बेकार हो चुके हैं और किसी के भी काम नहीं आए। बड़वानी में बने टीन शेड में तो होमगार्ड के जवान रह रहे हैं।
Published on:
30 Jun 2019 06:00 am
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