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मैया ने दिया ललना,पूर्णा में छोड़ा पालना

नि:संतान दंपती मनोकामना पूरी होने पर छोड़ते हैं पालनावर्षों से निभाई जा रही परंपराफोटो। दंपती ने पूर्णा मैया में अपने बच्चों का पालना छोड़ा।

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मैया ने दिया ललना,पूर्णा में छोड़ा पालना

Maya gave Lalna, left the cradle in Poorna,Maya gave Lalna, left the cradle in Poorna


भैंसदेही। मेले के अवसर मां पूर्णा नदी में मंगलवार को एक अलग ही नजारा था। नन्हें-नन्हें बच्चों को पालना सजाकर इसमें लिटाकर पूर्णा मैया में छोड़ा जा रहा था। इस दौरान भगत पूजा-पाठ कर पालने को छोड़ रहे थे और यह सब देखकर दंपती खुश नजर आ रहे थे। यह सब जिन लोगों ने पहली बार देखा तो आश्चर्य में पड़ गए। वही अन्य लोगों के लिए यह कोई नया नहीं था। वर्षों से चली आ रही परंपरा यहां निभाई जा रही है। ऐसा माना जाता है कि मां पूर्णा मैया नि:संतानों की गोद भरती है,इसके बाद दंपती यहा पहुंचते हैं और अपने बच्चे को पालने में छोड़ा जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा पर भैंसदेही के अंतर्गत ग्राम पंचायत काटोल के देवलवाड़ा में पूर्णा नदी में कई दंपती अपने बच्चे के पालने को छोडऩे पहुंचे। अपने बच्चे को पालने में डालने आए विजय ने बताया उसकी दो बेटी है। मां पूर्णा के दर्शन करने आए थे। उस समय मां पूर्णा की पूजा-अर्चना कर बेटा मांगा था। मेरी मनोकामना पूरी हो गई और बेटा हो गया। इस वजह से अपने बेटे को मां पूर्णा में लेकर आया हंू। पालने में बेटे को डालकर पूर्णा में छोड़ा। माधुरी ने बताया कि उसे संतान नहीं हो रही थी। पूर्णा मैया से मन्नत मांगी थी कि मुझे संतान हो जाए। मुझे बच्चा होने पर पूर्णा मैया में पालने में बच्चे को डालकर छोड़ा है। वही पर पूजा-पाठ कर बच्चों को पालने में छोडऩे वाले महाराज ने बताया पूर्णा मैया नि:संतान को संतान देती है। सच्चे मन से मां की आराधना करने पर मां गोद जरुर भरती है। बचपन से ही हम यह सब देखते आ रहे हैं और बच्चों का पालना पूर्णा मैया में छोड़ते हैं। आज तक किसी को कोई परेशानी नहीं हुई है।
वर्षों पुरानी है परंपरा
वही मंदिर के पुजारी पिंटू महाराज ने बताया मैया के प्रति लोगों की भारी आस्था है। मैया लोगों की मन्नत पूरी करती है। लगभग सौ वर्षों से हम यह परंपरा देखते आ रहे हैं। नि:संतान दंपती यहां पर पूजा-अर्चना करने आते हैं और उनकी मुराद पूरी होने पर बच्चों को पूर्णिमा के दिन पालने में छोड़ा जाता है। आज तक किसी को कोई परेशानी नहीं हुई। कभी कोई अप्रिय घटना नहीं घटी।
सूतक में भी की पूजा-अर्चना
पूर्णा तट पर आयोजित होने वाले मेले पर मंगलवार को लगने वाले चंद्र ग्रहण का कोई असर नहीं देखा गया। ग्रहण के सूतक काल में भी क्षेत्र के सैकड़ों पूर्णा माई के भक्तों ने अपने परिवार के देवी देवताओं को ले जाकर तीर्थ कर दीपदान किया। प्रशासन ने मेले में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे। मेले में बेहतर व्यवस्था नजर आई।
अन्य प्रदेशों से भी आते हैं श्रद्धालु
कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रतिवर्ष देवलवाड़ा के पूर्णा तट पर लगभग 15 दिनों तक धार्मिक मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश अनेक जिले से श्रद्धालु पूर्ण सलिला मां पूर्णा के पावन जल में तीर्थ करने आते हैं।