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राजा मानसिंह हत्याकांड के सभी 11 दोषियों को आजीवन कारावास

-फर्जी एनकाउंटर के मृतकों को 30-30 व घायलों को दो-दो हजार रुपए मुआवजा-अब तक दोषियों की सुरक्षा आदि पर व्यय हुए 15 करोड़ रुपए

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राजा मानसिंह हत्याकांड के सभी 11 दोषियों को आजीवन कारावास

राजा मानसिंह हत्याकांड के सभी 11 दोषियों को आजीवन कारावास

भरतपुर. डीग के स्व. राजा मानसिंह की हत्या में दोषी पाए गए 11 पुलिसकर्मियों को बुधवार को फैसला सुनाया गया। मथुरा की जिला जज साधना रानी ठाकुर ने सभी पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। दोषियों पर फैसला सुनाने के बाद राजा मानसिंह का परिवार वहां मौजूद रहा। राजा मानसिंह की पुत्री कृष्णेंद्र कौर उर्फ दीपा सिंह अपने परिजनों के साथ बुधवार को फैसला सुनने के लिए पहुंचीं। बता दें कि मंगलवार को भरतपुर के राजा मानसिंह और दो अन्य की हत्या के मामले में 11 पुलिसकर्मियों को दोषी करार दिया गया था। 21 फरवरी 1985 को हुए इस बहुचर्चित हत्याकांड की सुनवाई के दौरान 1708 तारीखें पड़ीं और 25 जिला जज बदल गए।

कोर्ट के फैसले पर विस्तार से एक नजर...

मंगलवार को कोर्ट ने 11 आरोपितों को दोषी करार दिया था। राजा मान सिंह हत्याकांड में आठ बार फाइनल बहस हो गई थी और 19 जज भी बदल चुके थे। राजा के खिलाफ मंच और हेलीकॉप्टर तोडऩे के मामले में सीबीआइ ने एफआर लगा दी थी। 17 सौ से अधिक तारीखें भी पड़ी, जबकि अनुमान के मुताबिक मुकदमे में आरोपित बनाए गए 18 पुलिसकर्मियों की सुरक्षा में 15 करोड़ रुपए से अधिक का खर्च भी हुआ। 35 साल बाद इस बहुचर्चित मामले में हत्या के दोषी करार दिए पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। पूर्व राजपरिवार की ओर से विजय सिंह, गिरेंद्र कौर, कृष्णेंद्र कौर दीपा, दुष्यंत सिंह, गौरी सिंह, दीपराज सिंह कोर्ट में मौजूद रहे। साथ ही राजस्थान सरकार मुठभेड़ में मारे गए लोगों के परिजनों को 30-30 हजार और घायलों के परिजनों को दो-दो हजार का मुआवजा देगी। राजा मान सिंह हत्याकांड की सुनवाई जयपुर कोर्ट और उसके बाद जिला सत्र एवं न्यायाधीश की अदालत में हुई थी। करीब 35 साल तक चले इस मुकदमे को लेकर वादी पक्ष के अधिवक्ता नारायण सिंह विप्लवी ने बताया कि मामले में राजा मान सिंह के खिलाफ मंच और हेलीकॉप्टर तोडऩे के मामले में सीबीआइ ने अपनी जांच के बाद फाइनल रिपोर्ट भी लगा दी थी। राजा मानसिंह के समर्थक बाबूलाल से पुलिस ने जो तमंचा बरामद दिखाया था, उसमें भी फाइलन रिपोर्ट लग गई थी। एसएचओ वीरेंद्र सिंह के बाद इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर कान सिंह सिरबी ने की। इसके बाद मामला सीबीआइ को स्थानांतरित हो गया। सीबीआइ ने सिरबी समेत तीन पुलिसकर्मियों के खिलाफ फर्जी दस्तावेज तैयार करने का आरोप पत्र दाखिल किया था। लेकिन सीबीआइ अदालत में ये साबित नहीं कर सकी। ऐसे में सिरबी समेत तीन पुलिसकर्मी दोषमुक्त हो गए। इधर, इस मामले में आठ बार फाइनल बहस को गई थी, लेकिन हर बार जज बदल गए। अब तक इस मामले में 19 जज बदल चुके हैं। जबकि 20वें जज ने इस पर अपना फैसला सुनाया है। करीब आठ महीने तक हर 15 दिन में चार दिन लगातार इसी मुकदमे में बहस भी हुई। तब जाकर यह निर्णय आया है। अधिवक्ता के मुताबिक, राजस्थान से अभियुक्त और दोष मुक्त ठहराए गए लोगों को यहां तक लाने में अनुमान के मुताबिक पंद्रह करोड़ रुपये सुरक्षा पर खर्च हो हुए हैं।

11 में से सभी दोषियों की उम्र 75 से 85 साल के बीच

35 साल का लंबा वक्त। इस दौरान बहुत कुछ बदल गया। जब राजा मान सिंह और उनके दो साथियों की हत्या हुई तो दोषी राजस्थान पुलिस और आरएसी की नौकरी कर रहे थे। मुकदमे के ट्रॉयल के दौरान ही सीबीआइ की चार्जशीट में शामिल 18 पुलिसकर्मी सेवानिवृत्त हो गए। अब उम्र के आखिरी पड़ाव में हैं। ज्यादातर की उम्र 70 बरस पार कर गई है। ऐसे में कई दोषियों का शरीर भी साथ नहीं दे रहे। मंगलवार को कोर्ट लाए गए, तो एसटीएफ और पुलिस ने उन्हें सहारा दिया। राजा मान सिंह हत्याकांड में दोषी पाए गए तत्कालीन डीएसपी कान सिंह भाटी की उम्र अब 82 बरस की हो गई है। वहीं तत्कालीन एसएचओ वीरेंद्र सिंह 78 साल के हैं। सुखराम की उम्र 72 है। अन्य दोषियों की उम्र भी सात दशक पार कर चुकी है। ऐसे में दोषी करार दिए गए कई मुल्जिम तो ठीक से चल भी नहीं सकते हैं। मंगलवार को एसटीएफ वज्र वाहन से सभी मुल्जिमों को लेकर कोर्ट परिसर पहुंची। एक मुल्जिम वाहन से उतरते ही लडखड़़ाने लगा, ऐसे में उन्हें एसटीएफ ने सहारा दिया। वह चलने की स्थिति में नहीं थे, तो उन्हें बैठाया, पानी पिलाया, फिर सहारा देकर कोर्ट रूम तक ले गए। यही हाल एक अन्य मुल्जिम का रहा। उन्हें भी सहारा देकर पुलिसकर्मी कोर्ट रूम ले गए। सजा होने के बाद भी इन्हें सहारा देकर ही वज्र वाहन से अस्थायी जेल ले जाया गया।

स्व. राजा मानसिंह की अस्थियां यहां यमुना में विश्राम घाट पर विसर्जित की गई थीं

भरतपुर राज घराने के मथुरा से विशेष लगाव के कारण राजा मानसिंह की हत्या से समूचा जनपद स्तब्ध था। उनके अस्थिकलश राज परिवार के लोग यमुना में विर्सजित करने के लिए विश्राम घाट पर पहुंचे तो उस समय अंतिम दर्शनों को भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। बताते हैं कि अंग्रेज शासनकाल में यह परिवार ही ऐसा था, जो झुका नहीं। ब्रजवासियों का भी उनका परिवार खास चहेता रहा। यह वजह रही कि सन 1967 के चुनाव में राजा मानसिंह के भाई ने मथुरा संसदीय सीट पर चुनाव लड़ा तो पूरा चुनाव एक तरफा हो गया। कहा जाता है कि उस समय जनता खुद उनकी पोलिंग एजेंट के रूप में काम करने के लिए उतर आयी थी। परिणामस्वरूप जनसंघ के मगनलाल शर्मा को बुरी तरह से चुनाव हारना था। इस चुनाव के प्रत्यक्षदर्शी पूर्व पालिकाध्यक्ष वीरेन्द्र कुमार अग्रवाल ने बताया कि 1967 में लोकसभा व विधान सभा के चुनाव एक साथ हुए थे। उस समय उनकी ड्यूटी पोलिंग एजेंट के रूप में ग्राम सेही में लगी थी। तब जनता से यह कहकर उन्होंने ड्यूटी दी थी कि वे विधानसभा प्रत्याशी टीकम सिंह के पोलिंग एजेंट हैं।

भरतपुर राजघराने से मथुरा का लगाव

भरतपुर राजघराना का असर न केवल भरतपुर बल्कि मथुरा सहित समूचे ब्रज में रहा है। भरतपुर राजघराने से मथुरा का लगाव रहा है। मथुरा में भरतपुर राजघराने की तमाम संपत्ति रही हैं। भरतपुर राजघराने का मथुरा पर कितना असर रहा है इसका प्रमाण यह है कि राजघराने के बच्चू सिंह यहां से सांसद रह चुके हैं। राजघराने के विश्वेंद्र सिंह भी मथुरा से चुनाव लड़ चुके हैं।

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