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महाराजा सूरजमल ने पढ़ाया था धर्म निरपेक्ष शासन पद्धति का पाठ

-बलिदान दिवस पर विशेष

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महाराजा सूरजमल ने पढ़ाया था धर्म निरपेक्ष शासन पद्धति का पाठ

महाराजा सूरजमल ने पढ़ाया था धर्म निरपेक्ष शासन पद्धति का पाठ

भरतपुर. महाराजा सूरजमल के शासन में जाति संप्रदाय का भेदभाव नहीं रहा। निजी सेवकों से लेकर सेना और राजकाज संचालक दरबार दीवाने आम और दीवाने खास में राज्य की सभी जन इकाइयों का प्रतिनिधित्व था, विश्वस्त व्यक्तियों में मुस्लिमजन उनके लिए प्राण न्यौछावर करने को तैयार रहते थे। इस प्रकार धर्म निरपेक्ष शासन पद्धति का पाठ भी सूरजमल ने पढ़ाया एवं प्रजातन्त्रमूलक व्यवस्था का सृजन किया जो भरतपुर राज्य का स्वरूप रहा है।
1721 ई. में मात्र 14 वर्ष की आयु में जब सूरजमल अपने पिता के दूत के रूप में सवाई जवसिंह से मिलने दिल्ली स्थित मुकाम पर पहुंचे तब उनके राजनैतिक जीवन का प्रारम्भ हुआ था। इस समय सूरजमल के पास कुछ नहीं था। उनके पिता बदनसिंह मुहकमसिंह की कैद में थे और उनकी मुक्ति एवं भविष्य की चिन्ता के साथ इन्होंने अपना सैनिक व राजनैतिक जीवन प्रारम्भ किया था, परन्तु 1763 ई. में जब उनकी मृत्यु हुई, तब भरतपुर का जाट राज्य हिन्दुस्तान का सर्वाधिक शक्ति सम्पन्न राज्य था और सूरजमल एक विशाल कोष, शक्तिशाली सेना और विस्तृत भू-भाग के स्वामी थे। उस समय उनके राज्य में अगरा, अलीगढ़, बल्लभगढ़, बुलन्दशहर, धौलपुर, एटा, हाथरस, मेरठ, मथुरा, रोहतक, होडल, गुडगांव, फर्रुखनगर, मेवात, रेवाड़ी आदि क्षेत्र शामिल थे। इस राज्य की लंबाई 200 मील व चौड़ाई 100 मील से भी अधिक थी जो उस काल का सर्वाधिक सम्पन्न व श्रेष्ठ राज्य था।
सूरजमल के शासनकाल में धर्म के नाम पर भेदभाव या उत्पीडऩ का कोई उदाहरण नहीं मिलता है। इसके विपरीत अब्दाली की मुस्लिम सेनाओं ने धर्म के नाम पर जब उसके राज्य में मथुरा, वृन्दावन एवं गोकुल में अत्याचार एवं विनाश का प्रदर्शन किया। तब भी सूरजमल ने धैर्य नहीं खोया। धार्मिक मामलों में वह राजनैतिक औचित्य के अनुसार निर्णय लेते थे। उसके राज्य में मुस्लिम मस्जिदों की पवित्रता यथावत बनी रही। व्यक्तिगत रूप से सूरजमल हिन्दू धर्म के वैष्णव सम्प्रदाय अनुयायी थे, किन्तु राज्य की नीति एवं सार्वजनिक मामलों में उन्होंने उदार सामंजस्य की नीति का पालन किया। भरतपुर की जामा मस्जिद, लक्ष्मण एवं गंगा मन्दिर आज भी भरतपुर में साम्प्रदायिक सद्भाव के जीवन्त प्रमाण हैं जो अन्य किसी राज्य में नहीं है। उसके व्यक्तिगत सेवकों में करीमुल्लाह खान और मीर पतासा प्रमुख थे। उसकी सेना में मुसलमान व बहुत बड़ी संख्या में मेव थे। मीर मुहम्मद पनाह उसकी सेना में अति महत्वपूर्ण पद पर था, इसने घसेरा के दुर्ग पर सर्वप्रथम विजयी झण्डा फहराते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी। सेना एवं प्रशासन में बिना किसी भेदभाव के जाट एवं मुसलमानों के अलावा ब्राहम्ण, राजपूत, गुर्जर सहित सभी वर्गों के लोग थे।
किसान संस्कृति पर आधारित भरतपुर राज्य के संस्थापक महाराजा सूरजमल ने मुगल बजीर मंजूर अली सफदरजंग को अपने डीग के किले में शरण देकर, पानीपत के मैदान से जान बचाकर भागे कई मराठा सेना नायक तथा सदाशिव राव भाऊ की पत्नी को संरक्षण देकर, मीर बख्शी सलामत खां को मैदान में पराजित करके, रूहेला सरदार अहमद शाह वंगश को हिमालय की तराइयों तक खदेड़ कर, बजीर गाजिउद्दीन तथा मुगल बादशाह अहमद शाह अब्दाली की कूटनीति को ध्वस्त करके, मल्हारराव होल्कर बजीर गाजिउद्दीन तथा जयपुर नरेश माधोसिंह की सम्मिलित सेना को कुम्हेर के घेरे में धूल चटाकर, डासना (अलीगढ़) के युद्ध में नजीब खां को हार का मुंह दिखाकर अपनी कुशल रणनीति के बल पर अहमद शाह अब्दाली को भारत से लौटाने के लिए विवश कर और भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर, शक्तिशाली शासन की योजना के उद्देश्य से, छोटे राज्य तथा नबावों से राज्य छीनकर एक संगठित शासन तथा राज्य की स्थापना करके दुनिया को अपने पराकमी एवं भारतीय संस्कृति के रक्षक का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।
भारत का यह दुर्भाग्य था कि हिन्दू पातशाही का स्वप्न देखने वाली मराठा शक्ति महाराजा सूरजमल की देशभक्तिपूर्ण नीति को न समझ पाई और उनको सन्देह की नजर से देखती रही। देश के शक्तिशाली छोटे-छोटे राज्य तथा नबाव अपने स्वार्थों में डूबे रहे। देश को अंग्रेजी ताकत के सामने घुटने टेकने के लिए तैयार करते रहे। महाराजा सूरजमल ने अंग्रेजी ताकत को पराजित करने के लिए बंगाल के नवाब मीर कासिम की सहायता करने की योजना बनाई थी, किन्तु 25 दिसम्बर 1763 को उनके स्वर्गवास के कारण न केवल उनकी योजना अधूरी रह गई, वरन् अंग्रेजी फौज के लिए भारत का द्वार खुल गया।

रामवीर सिंह वर्मा

वरिष्ठ साहित्यकार, भरतपुर