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हमारे शहर की फिजा में ऐसे ही घुलती रही जहरीली धुआं तो दिल्ली दूर नहीं...पढि़ए पत्रिका की खास रिपोर्ट

सुृप्रीम कोर्ट ने कोयला और लकड़ी जैसे ठोस ईधन को जलाने पर रोक लगा दी है पर उसे देखने वाला कोई नहीं है।

भिलाई

Published: December 07, 2017 10:08:24 am

कोमल धनेसर@भिलाई. शहर की आबोहवा में घुलती जहरीली गैस लोगों का जीना मुहाल कर रही है। सुृप्रीम कोर्ट ने कोयला और लकड़ी जैसे ठोस ईधन को जलाने पर रोक लगा दी है पर उसे देखने वाला कोई नहीं है। आतिशबाजी पर रोक के हाईकोर्ट के आदेश का पालन कैसे होगा, इसकी भी चिंता किसी को नहीं है। शहर के बीचोबीच बनी बस्तियों में सुबह-शाम खुलेआम कंडे, कोयले और लकडिय़ां जलाई जा रही है।
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पर्यावरण संरक्षण बोर्ड केवल शहर में तीन स्थान पर प्रदूषण को मापकर अपनी खानापूर्ति कर ले रहा है। वहीं आरटीओ केवल अपने रिकॉर्ड में ही पुरानी गाडिय़ों का रजिस्ट्रेशन कैंसल कर रहा है। निगम और अन्य विभाग भी अपने हिसाब से अपना काम निपटा रहे हैं। प्रदूषण को रोकने ठोस पहल कौन करेगा इसकी जिम्मेदारी लेना ही नहीं चाहता घुम फिरकर बात लोगों की जागरुकता पर आ टिकती है,लेकिन शहर की फिजां में घुलते जहर को महसूस करना कोई नहीं चाहता। आखिर में मुसीबत सभी की बढ़ गई है जो इस दूषित हवा में सांस लेकर बीमारियों की गिरफ्त में आ रहे हैं।
गैस है पर नहीं जलाते
डबरापारा का हाल यह है कि यहां 90 प्रतिशत घरों में गैस कनेक्शन है। पर जुगाड़ में कोयला खरीद लाते हैं और उनका काम मात्र 2 सौ रुपए में हो जाता है। रामनाथ ने बताया कि उनके घर गैस के दो कनेक्शन है, लेकिन खाना बनाने ज्यादातर कोयले का उपयोग की किया जाता है। ट्विनसिटी की हवा में धूल के कण मानक स्तर से कई गुना ज्यादा हो गए हैं।
खासकर डबरापारा के इलाके में जलने वाले ठोस र्इंधन के साथ ही नजदीक स्थित भिलाई इस्पात संयंत्र में चल रहे एक्सपांशन से इमिशन ज्यादा है। ठोस ईधन ज्यादा स्मोल्डिंग पैदा करता है। वायुमंडल में आर्गनिक कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है। कार्बन मोनोऑक्साइड भी ज्यादा हो जाता है। सॉलिड फ्यूल्स की वजह से खासकर महिलाओं में टीबी, खांसी, अस्थमा, सांस की बीमारी भी होने लगती है।
पर्यावरण संरक्षण बोर्ड, रेलवे को पत्र लिख दिया रैक प्लेटफार्म पर ही खड़ी करें
जिम्मेदारी- ठोस ईंधन सहित आतिशबाजी पर रोक लगाना, प्रदूषण के स्तर की निरंतर जांच. उद्योगों की जांच करना, कार्रवाई करना।
खानापूर्ति एेसे - कोयला जलाने से रोकने की बजाए रेलवे को पत्र लिख दिया कि कोयले की रैक प्लेटफार्म पर ही खड़ी करें। धूल के कण को हवा में मिलने से रोकने पानी का छिड़काव कराया। कार्रवाई की बात आई तो निगम और फूड डिपार्टमेंट पर टाला। आतिशबाजी का अब तक एक भी मामला नहीं।
आया जिसमें विभाग ने शहर में जाकर कोई कार्रवाई की हो।
परिवहन विभाग, पीयूसी जांचने का काम हमारा नहीं, ट्रैफिक पुलिस का है
जिम्मेदारी- लगातार पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल सर्टिफिकेट की जांच, मॉानिटरिंग, पुरानी गाडिय़ों को चलन से बाहर करना, प्रदूषण फैलाने वाली गाडिय़ों पर कार्रवाई।
यह किया- 12 साल पुरानी बसें और 15 साल पुरानी गाडिय़ों का रजिस्ट्रेशन कागजों में ही कैंसल। पीयूसी की जांच के लिए रिर्सोसेस कम का बहाना। प्रदूषण रोकने सख्त कार्रवाई नहीं।
वाले वाहन को रोकने की सख्त कार्रवाई नहीं। अधिकारी करते हैं, पीयूसी जांचने का काम उनका नहीं ट्रैफिक पुलिस की जिम्मेदारी।
नगर निगम , केवल बैठक और अधिकारियों को निर्देश दे रहे हैं
जिम्मेदारी- होटल-ढाबा और बस्तियों में ठोस ईंधन को जलाने से रोकने समझाइश और कार्रवाई
किया यह- बस्तियों का सर्वे करा लिया और रिपोर्ट दे दी कि कुछ लोग ठोस ईधन जलाते हैं, लेकिन उन्हें रोकने कार्रवाई कुछ नहीं की। होटलों और ढाबों में अब भी लकडिय़ों से चूल्हे जल रहे। शहर के ट्रेचिंग ग्राउंड में भी कचरे को खुलेआम जलाया जा रहा।
डबरापारा, खुर्सीपार,पावर हाउस में सुबह और शाम के वक्त धूल के कण का मानक स्तर और भी बढ़ जाता है, क्योंकि हाईवे होने के कारण यहां के गुजरने वाले वाहनों का धुआं और यहां घरों में उपयोग होने वाले कोयले से निकलने वाला धुआं 40 प्रतिशत प्रदूषण फैलाते हैं.।जबकि 60 प्रतिशत वायु प्रदूषण प्लांट और इंडस्ट्री की वजह से हो रहा है। सबसे खास बात यह है कि धूल के साथ केमिकल भी वायुमं्डल में मौजूद है, जो लोगों के लिए खतरनाक साबित होते हैं। इनमें खासकर नाइट्रोजन ऑक्साइड. सल्फर डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड का स्तर भी दो गुना से ज्यादा बढ़ गया है।
अतिरिक्त परिवहन अधिकारी श्रीकांत वर्मा ने बताया कि पीयूसी का मामला हो या पुरानी गाडिय़ों के चलन का। लोग जागरूक हैं ही नहीं। प्रदूषण जांच का काम हमारा नहीं है, लेकिन हमारी टीम जांच करती है। यह तो ट्रैफिक पुलिस को करना चाहिए। कमिश्न चरोद निगम लोकेश्वर साहू ने बताया कि कलेक्टर के साथ हुई बैठक में हमें ठोस ईधन जलाने वालों को समझाइश देने कहा गया है। हमने डबरापारा से लेकर उरला तक सर्वे किया है। 5 सौ लोगों के पास गैस कनेक्शन नहीं है। होटल वालों को समझाया जाएगा।
सीधी बात, अजय चंद मालू, क्षेत्रीय अधिकारी, पर्यावरण संरक्षण बोर्ड दुर्ग-भिलाई
Q शहर की बस्तियों में जलने वाले सॉलिड फ्यूल्स को रोकने विभाग ने क्या किया?
A वो तो नगर निगम और फूड डिपार्टमेंट की टीम कार्रवाई कर रही है।
Q पर आपके विभाग ने इस मामले में क्या किया?
A खुर्सीपार क्षेत्र में कोयले का ज्यादा उपयोग हो रहा है। हमने सीधे रेलवे को ही चिट्ठी लिखी है कि वे कोयले से भरी मालगाड़ी प्लेटफार्म पर ही रोंके।
Q तो क्या रेलवे को चिट्ठी लिखने से प्रदूषण कम हो जाएगा?
A जब ट्रेक ही नहीं रुकेगा तो लोग कोयला चोरी नहीं कर पाएंगे और वह कम जलेगा।
Q अभी शहर में प्रदूषण की स्थिति क्या है?
A इसलिए पानी का छिड़काव कर धूल को रोका जा रहा है।
patrikaदिन ढलने के पहले ही हर घर के आंगन में कोयला और गोबर के कंडे से सजी सिगड़ी तैयार हैं.. बस मिट्टीतेल डाला और कुछ देर में पूरी बस्ती धुआं-धुआं... गली में चलना भी मुश्किल और सांस लेना भी मुश्किल। यह हाल जीई रोड़ स्थित डबरा पारा यानी भिलाई तीन के वार्ड 12 रेलवे कॉलोनी का है।
जहां आज भी भोजन बनाने घरों में कोयला, कंडे और लकड़ी का उपयोग किया जा रहा है। ऐसा ही हाल मरोदा बस्ती, नेवईभाठा, कैंप-2, खुर्सीपार, पावरहाउस, छावनी के इलाकों का है। सरकार ने पिछले सप्ताह ही प्रदेश के पांच शहरों को प्रदूषण मुक्त बनाने 31 जनवरी तक आतिशबाजी पर रोक लगी है और यहां ठोस ईधन की वजह से शहर की फिजां प्रदूषित हो रही है।
जानकारों की मानें तो वायुमंडल में प्रदूषण फैलाने वाले स्त्रोत में से एक ठोस ईधन भी है जिसकी वजह से 26 से 30 प्रतिशत तक जहरीली गैस वायुमंडल में घुल रही है। खुलेआम बस्तियों में ठोस ईधन को जलाए जाने से रोकने पर्यावरण संरक्षण विभाग नाकाम है। कार्रवाई के नाम पर पर्यावरण संरक्षण बोर्ड दूसरे विभागों का मुंह ताकता है। विभाग के पास अपनी कोई प्लानिंग नहीं है।
पर्यावरणविदें की मानें तो हवा में मौजूद धूल के बारीक कण से लोगों को फेंफड़े और सांस संबंधी बीमारी मुफ्त में मिल रही है। ठंड के दिनों में हवा में धूल के कणों का मानक स्तर कई बार दो से तीन गुना तक पहुंच जाता है, जो व्यक्ति की सेहत के लिए काफी खरतरनाक माना जाता है।

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