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बीई, एमई के रिसर्च प्रोजेक्ट में अब नहीं चलेगा कट-कॉपी- पेस्ट, साफ्टवेयर जांचेगा कितना सही कितना गलत

रिसर्च प्रोजेक्ट बनाने के दौरान विद्यार्थी कट-कॉपी-पेस्ट का सहारा ले रहे हैं, जिससे रिचर्स वर्क और मेजर प्रोजेक्ट्स में गुणवत्ता नहीं दिखाई पड़ती।

भिलाई

Published: December 06, 2017 10:58:57 am

भिलाई. इंजीनियरिंग की गुणवत्ता सुधारने अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने अहम निर्णय लिया है। अब तक सिर्फ पीएचडी के थीसिस ही प्लगीरिजम सॉफ्टवेयर की मदद से परखे जाते रहे हैं, लेकिन नई व्यवस्था के तहत अब बीई और एमटेक भी इसके दायरे में आ जाएगा। यानि बीई और एमटेक के मेजर व माइनर प्रोजेक्ट्स को सॉफ्टवेयर की मदद से जांचा जाएगा।
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एआईसीटीई ने कहा है कि रिसर्च प्रोजेक्ट बनाने के दौरान विद्यार्थी कट-कॉपी-पेस्ट का सहारा ले रहे हैं, जिससे रिचर्स वर्क और मेजर प्रोजेक्ट्स में गुणवत्ता नहीं दिखाई पड़ती। इसी तरह विद्यार्थियों में नवाचार के प्रति भी उत्साह कमजोर पड़ रहा है। तकनीकी विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेजों में फिलहाल बीई और एमटेक के प्रोजेक्ट्स बिना प्लगीरिजम सॉफ्टवेयर के जांचे जाते हैं।
अधिकतर विद्यार्थी पुराने प्रोजेक्ट वर्क को ही नया रूप देकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। कॉलेज भी इसमें अधिक रुचि नहीं दिखाते। हालांकि एमटेक के रिसर्च प्रोजेक्ट की जांच विवि स्तर पर होती है, लेकिन बीई में हालात सबसे ज्यादा खराब होते हैं।
अधिकतर विद्यार्थी इंटरनेट की मदद से पूरी की पूरी थीसिस या प्रोजेक्ट कॉपी कर उसे ही कॉलेज को थमा दिया करते हैं। यदि नई व्यवस्था को पूरी तरह लागू किया गया तो विद्यार्थियों को नवाचार के प्रोजेक्ट ही करने होंगे। कॉपी-पेस्ट का सिलसिला थमेगा।
कॉलेजों को करनी होगी व्यवस्था
एआईसीटीई ने कॉलेजों को एंटी प्लगीरिजम सॉफ्टवेयर की व्यवस्था करने को कहा है। बीई और एमटेक के विद्यार्थियों को इस नई व्यवस्था से जागरुक करने के लिए निर्देश भी जारी किए हैं। परिषद ने स्पष्ट किया है कि कॉलेजों को प्लगीरिजम सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से ही रिसर्च व मेजर प्रोजेक्ट के तथ्य परखने होंगे।
यदि विद्यार्थियों के द्वारा प्रोजेक्ट्स में कॉपी-पेस्ट की स्थिति दिखाई दे तो दण्डात्मक कार्रवाई भी की जानी चाहिए। यह एक विशेष सॉफ्टवेयर है, जो रिसर्च प्रोजेक्ट या थीसिस की गुणवत्ता जांचने के लिए उपयोग किया जाता है। इसकी मदद से विशेषज्ञ यह पता लगाते हैं कि प्रोजेक्ट का कितना हिस्सा इंटरनेट पर मिलने वाली सामाग्री से लिया गया है।
विश्वविद्यालय स्तर पर अभी 25 फीसदी तक इंटरनेट कंटेंट की छूट दी जाती है। यह सॉफ्टवेयर इतना एडवांस होता है कि थीसिस अपलोड करने पर उसका कंटेट कहां से और कितना लिया गया सबकुछ साझा करता है। कुलपति सीएसवीटीयू डॉ. एमके वर्मा ने बताया कि यह एक अच्छी व्यवस्था साबित होगी। एआईसीटीई ने कॉलेजों को निर्देशित किया है कि विद्यार्थियों को प्लगीरिजम सॉफ्टवेयर के लिए जागरुक करे।
 

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