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छत्तीसगढ़ अजब-गजब: भिलाई से फिर 40 कबूतरों की चोरी, पढि़ए पूरी खबर

दुर्ग शहर से चोरी के बाद भिलाई सुपेला स्थित कॉन्ट्रैक्टर कॉलोनी के पास घर से अज्ञात चोरों ने बेशकीमती कबूतरों की चोरी कर ली है।

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Bhilia news

भिलाई. शहर में फिर एकबार कबूतर चोरी का अजीबो-गरीब मामला सामने आया है। हॉल ही में दुर्ग शहर से चोरी के बाद भिलाई सुपेला स्थित कॉन्ट्रैक्टर कॉलोनी के पास घर से अज्ञात चोरों ने बेशकीमती कबूतरों की चोरी कर ली है। चोरी की पहली घटना के आरोपी की गिरफ्तारी और कबूतर बरामद भी नहीं हुआ है बीती रात भिलाई में चोरी की दूसरी घटना हो गई। कबूतर मालिक हरेराम प्रसाद ने बताया कि उनके पास कुल 90 कबूतर दबडा खाने में मौजूद थे, जिसमें 40 कबूतर गायब हो गए है। घटना शुक्रवार और शनिवार की दरमियानी रात की बताई गई है।

घटना की जानकारी सुबह हुई
कबूतर मालिक ने बताया कि वे जब सुबह सात बजे सोकर उठे दबड़ा खाने को देखा तो 40 कबूतर कम थे। उन्होंने कबूतरों के चोरी की सूचना तत्काल सुपेला थाने को दी। उन्होंने पुलिस को बताया कि कबूतरों को प्रतिस्पद्र्धा के लिए तैयार किया जा रहा था। सभी कबूतर लगातार 8 घंटे तक उडऩे वाले थे। उन्होंने सभी कबूतरों को आगामी 27 मई की होने वाली कबूतर स्पर्धा में शामिल करने के लिए प्रशिक्षण देकर तैयार कर रहे थे।

इन प्रजातियों की हैं
चोरी हुए कबूतर की प्रजातियों में मद्रासी 10, हैदराबादी 12, बनारसी 12, गोला 6 शामिल है। चोरी गए कबूतरों की कीमत लाखों में आंकी गई है। कबूतर मलिक की मानें तो एख कबूतर की कीमत 20 हजार रुपए है। उनके अनुसार चोरी गए कबूतरों की कुल कीमती पांच लाख के आस-पास है।

जो जितनी देर आसमान में वही बनेगा विजेता
कबूतर उड़ान प्रतियोगिता बेहद खास होती है। इनके नियम भी सख्त होते हैं। कबूतरों को 2-4-6 के हिस्सों मेें उड़ान के लिए सुबह 7 बजे छोड़ा जाता है। सुपेला के एक और कबूतरबाजी के शौकीन संत वर्मा ने बताया प्रतियोगिता की पारदर्शिता के लिए अलग-अलग जगहों से अंपायर को बुलाया जाता है। जैसे भिलाई में होने वाली प्रतियोगिता में जबलपुर, इंदौर, रायपुर से अंपायर आते हैं। एक बार उडऩे के बाद यदि कबूतर पुन: मचान पर आकर या 100 फीट के दायरे पर बैठ जाए तो उसे स्पर्धा से बाहर मान लिया जाता है। कबूतर को लगातार 7 से 8 घंटे तक उडऩा होता है।जो कबूतर जितनी देर तक उड़ता है उसका समय नोट कर निर्णय किया जाता है। पहचान के लिए कबूतर के परों पर सील निशान लगाया जाता है। इससे कबूरतरों की पहचान आसानी से हो जाती है।

13 मई से शुरू होगी कबूतरबाजी
कबूतरबाजी एक जुमला बन गया हो। मुगलकाल, नवाबों और जागीरदारों के समय से चली आ रही कबूतरबाजी की परंपरा खत्म होने की कगार पर पहुंच गई है, लेकिन छत्तीसगढ़ में दुर्ग-भिलाई से रायपुर तक कबूतर पालने का शौक आज भी है। हर साल चिलचिलाती गर्मी में मई माह से जून तक प्रतियोगिता होती है। इस बार छत्तीसगढ़ कबूतर उड़ान प्रतियोगिता 13 मई से शुरू होगी।