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दुर्ग जिले की 6 विस. सीट दिलचस्प सियासी गणित, जाति, धर्म के आधार पर मिली टिकट, क्या जनता देखेगी प्रत्याशी की जाति ?

प्रत्याशी जाति, धर्म के आधार पर टिकट पाने में सफल तो हो गए, लेकिन अब उनके सामने अपनों के साथ परायों का दिल जीतने की असल चुनौती है।

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भिलाई

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Dakshi Sahu

Nov 13, 2018

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दुर्ग जिले की 6 विस. सीट दिलचस्प सियासी गणित, जाति, धर्म के आधार पर मिली टिकट, क्या जनता देखेगी प्रत्याशी की जाति ?

भिलाई. विधानसभा चुनाव में अब प्रचार जोरों पर है। दोनों प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस ने मतदाताओं को रिझाने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। फिलहाल मतदाताओं का मन टटोल पाना मुश्किल है, लेकिन जिस तरह से दोनों दलों ने कहीं जातिगत, तो कहीं धर्म व संप्रदाय और कहीं स्थानीय और बाहरी के आधार पर प्रत्याशाी उतारे हैं, उससे चुनावी समीकरण और दिलचस्प हो चला है। प्रत्याशी जाति, धर्म के आधार पर टिकट पाने में सफल तो हो गए, लेकिन अब उनके सामने अपनों के साथ परायों का दिल जीतने की असल चुनौती है।

पाटन - पहली बार कुर्मी वर्सेस साहू
पाटन एकमात्र ऐसी सीट है जहां अब तक हुए 11 विधानसभा चुनाव में 10 बार कुर्मी समाज से ही विधायक चुने गए। यहां हर बार कुर्मी वर्सेस कुर्मी प्रत्याशी ही टकराते रहे हैं। कांगे्रस और कुर्मी समाज के अभेद्य गढ़ पाटन में भाजपा ने पहली बार साहू उम्मीदवार मोतीलाल को मैदान में उतारा है। 2008 में परिसीमन के बाद क्षेत्र की भौगोलिक के साथ-साथ अब राजनीतिक परिस्थितियां भी बिलकुल बदल गई है। ३५ त्न कुर्मी बहुल पाटन में अब गुंडरदेही के साहू बहुल क्षेत्र 45 गांव जुड़ गए हैं। इससे जातिगत आंकड़ा का अनुपात बदल गया है। यहां जातिगत राजनीति सबसे ज्यादा हावी है। दोनों दल अपने-अपने समाज के साथ अन्य जातियों व समुदाय का भरोसा जीतने जोर लगा रहे हैं।

दुर्ग ग्रामीण - साहू वर्सेस साहू
सा हू और कुर्मी मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर है। 2008 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आए इस सीट पर पहली बार कांग्रेस से कुर्मी समाज की प्रतिमा चंद्राकर विजयी रहीं। दूसरे चुनाव में भाजपा की रमशीला साहू चुनी गईं। इस बार भाजपा ने साहू समाज से जागेश्वर साहू को मौका दिया है। कांग्रेस ने कुर्मी समाज से प्रतिमा को उतारा था, लेकिन नामांकन के बाद अचानक उनका टिकट काटकर सांसद ताम्रध्वज साहू का नाम तय कर दिया। कां ग्रेस में अचानक हुए इस नाटकीय उलटफेर को जातिगत समीकरण का ही आधार माना जा रहा है। अब यहां भाजपा साहू के साथ-साथ कांग्रेस के फैसले से नाराज कुर्मी समाज को भी साधने का प्रयास कर रहे हैं।

अहिवारा - गुरु और राजमहंत में मुकाबला
अ नुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित अहिवारा में कुर्मी, साहू और सतनामी समाज की संख्या लगभग बराबर है। भाजपा ने जहां सांवलाराम डाहरे को दूसरी बार मौका दिया है, वहीं कांग्रेस ने आरंग के पूर्व विधायक गुरु रुद्र कुमार को आजमाया है। एक दल सतनामी समाज के गुरु जैसे प्रतिष्ठित पद का राजनीति लाभ लेने मे लगा है, तो दूसरा राजमंहत की सामाजिक पदवी का। यहां दोनों प्रत्याशियों की सामाजिक प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। आधा ग्रामीण और आधा शहरी वाले इस विधानसभा क्षेत्र में वैसे तो नगरीय क्षेत्र के मतदाताओं के रुझान ही नतीजे तय करेंगे, लेकिन दोनों दलों का फोकस साहू, कुर्मी व अन्य जातियों पर है। यहां ज्यादातर साहू भाजपा व कुर्मी कांग्रेस समर्थक माने जाते हैं।

भिलाई नगर - यहां तो सबको साधना है
बीते पांच चुनावों में कांग्रेस अल्पसंख्यक और भाजपा सवर्ण वर्ग से ही टिकट और जनता भी दोनों को बारी-बारी से मौका देती रही है। इस बार कांग्रेस ने पिछड़ा वर्ग से प्रत्याशी उतारा है। मिनी इंडिया कहलाने वाली इस्पात नगरी में हर प्रांत, संप्रदाय, धर्म और जाति के लोग हैं। बीते दो-तीन चुनावों में यहां स्थानीय बनाम बाहरी का मुद्दा हावी रहा, मगर इस बार ऐसा नहीं है। दोनों प्रत्याशी भाजपा के प्रेम प्रकाश पांडेय और कांग्रेस के देवेंद्र यादव उत्तर भारतीय मूल के हैं। अब तक यहां जातिवाद का असर नहीं रहा। पहली बार यहां कुछ जातिगत संगठन सक्रियता दिखा रहे हैं। दोनों ही दलों का फोकस विभिन्न प्रांतों के मतदाताओं और श्रमिक संगठनों पर है।

वैशाली नगर - दोनों का अल्पसंख्यक पर दांव
य हां स्थानीय और उत्तर भारतवासी मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर है। एक तरफ बड़ी- बड़ी पॉश कॉलोनियां हैं तो दूसरी तरफ श्रमिक बहुल बस्तियां भी है। दोनों क्षेत्रों की जरूरत और समस्याएं अलग-अलग है। अब तक हुए तीन चुनाव में जनता ने भाजपा को दो और कांग्रेस को एक बार मौका दिया है। भिलाई नगर से टिकट कटने से धर्म विशेष के लोगों की नाराजगी दूर करने कांग्रेस ने यहां बदरुद्दीन कुरैशी को मैदान में उतारा। वहीं टिकट बांटने को लेकर अंतिम दौर तक ऊहापोह में फंसी भाजपा ने भी अल्पसंख्यक वर्ग से ही विद्यारतन भसीन पर दोबारा भरोसा जताया है। यहां भाजपा अपनी सरकार की उपलब्धि तो कांग्रेस नाकामियां गिना रही है।

दुर्ग शहर - स्थानीय, जाति और प्रांत का संघर्ष
य हां पिछड़ा वर्ग के मतदाता अधिक हैं। कांग्रेस सामान्य वर्ग से प्रत्याशी उतारता रहा है इसकी वजह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा का अपना प्रभाव है। वे यहां से लगातार जीतते रहे हैं। अब उनका बेटा अरूण वोरा छठवीं बार मैदान में हैं। भाजपा ने यहां पिछड़ा कार्ड खेला और सफल भी रही। यादव समाज से हेमचंद यादव को पांच बार टिकट दिया और वे तीन बार जीते भी। उनके निधन के बाद भाजपा ने पिछड़े वर्ग से ही कुर्मी समाज की चंद्रिका चंद्राकर को प्रत्याशी बनाया है। यहां जोगी कांग्रेस से प्रताप मध्यानी के उतरने से दोनों दलों का राजनीतिक समीकरण गड़बड़ा गया है। यहां अब स्थानीय ,जाति और प्रांत की लकीरें साफ दिखाई दे रही है।