29 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

CG News : सेमेस्टर परीक्षा में 65 फीसदी छात्र हुए फेल, साइंस कॉलेज का मामला

Chhattisgarh News : 65 फीसदी विद्यार्थी फेल हो गए। इसी तरह बीकॉम के 489 विद्यार्थियों में से 322 को एटीकेटी मिली है।

2 min read
Google source verification
durg_science_college_0.jpg

भिलाई. कोरोना के बहाने बोर्ड ने विद्यार्थियों पर कृपा तो बरसाई लेकिन इसने विद्यार्थियों की रीडिंग और राइटिंग हैबीट को पूरी तरह से खत्म कर दिया। क्योंकि कॉलेज की परीक्षा में जिन विद्यार्थियों को 72 फीसदी अंक तक मिले, वे कॉलेज में एक पन्ने का उत्तर तक भी ठीक से नहीं लिख पाए। ये चौंकाने वाली सच्चाई दुर्ग साइंस कॉलेज की परीक्षा में उजागर हुई है। न्यू एजुकेशन पॉलिसी के तहत कॉलेज ने इस साल सेमेस्टर आधारित परीक्षा कराई, जिसमें नतीजो में बीए का परिणाम महज 35 फीसदी रहा। 65 फीसदी विद्यार्थी फेल हो गए। इसी तरह बीकॉम के 489 विद्यार्थियों में से 322 को एटीकेटी मिली है। बीएससी के 821 विद्यार्थियों में से सिर्फ 357 ही उत्तीर्ण हुए। 235 को एटीकेटी और 270 विद्यार्थी हो गए हैं। सभी विषयों का परिणाम लगभग इसी तरह है। यह आंकड़े विद्यार्थियों के पढ़नेे-लिखने की क्षमता को उजागर कर रहे हैं।

हर जगह यही तस्वीर
रायपुर के ऑटोनोमस छत्तीसगढ़ महाविद्यालय में भी बीए का परिणाम 25 फीसदी, बीएससी 27 फीसदी और बीकॉम का रिजल्ट महज 55 फीसदी रहा है। ऐसा ही तस्वीर राजनांदगांव के दिग्विजय कॉलेज के नतीजों में भी बनी है। बिलासपुर के ऑटोनोमस कॉलेजों ने तभी तक परीक्षा ही नहीं कराई है।


इस तरह हुई परीक्षा
कोरोना काल में माशिमं का ओपन बुक एग्जाम और फिर बीते साल होम सेंटर में हुई बोर्ड परीक्षा में धड़ल्ले से बांटे गए अंकों का साइड इफेक्ट अब दिखाई देने लगा है।

इस तरह है एनईपी का सिस्टम
न्यू एजुकेशन पॉलिसी के तहत कॉलेज की सेमेस्टर परीक्षाओं में 40 फीसदी पार्सिंग मार्क्स है। नए सिस्टम से विद्यार्थी दो विषय में एटीकेटी ले सकता है, इसके आगे इसे फेल माना जाएगा। जो बच्चा फेल हो जाता है, वह अगले साल फिर से एडमिशन ले सकता है या एक्स के रूप में प्रथम सेमेस्टर में शामिल हो सकता है।

दुर्ग साइंस कॉलेज में इस साल ने न्यू एजुकेशन पॉलिसी के तहत परीक्षाएं हो रही हैं। नए नियम से स्नातक स्तर की परीक्षाएं सालाना न होकर सेमेस्टर आधारित हो गई हैं। उन्हें सेमेस्टर पैटर्न के हिसाब से ही पढ़ाया गया। कॉलेज प्रशासन का कहना है कि इन विद्यार्थियों की रीडिंग-राइटिंग हैबीट बढ़ाने के लिए उन्हें लिखकर याद करने व कक्षा में भी लिखकर जवाब देने की आदत डलवाई गई, लेकिन ऐन परीक्षा के दिन सैकड़ों विद्यार्थी एक पन्ने का उत्तर भी नहीं लिख पाए। स्कूल की तरह कॉलेज में शॉर्ट आंसर नहीं होता है, यह बात बताने के बाद भी विद्यार्थियों ने मुख्य उत्तरपुस्तिका तक को पूरा नहीं भरा।

सीबीएसई के छात्र हो गए बाहर
हर साल साइंस कॉलेज सीबीएसई के 25 फीसदी बच्चों को एडमिशन देता था, लेकिन इस साल आंकड़ा महज 2 फीसदी है। वजह है, सीबीएसई ने हमेशा की तरह पुराने पैटर्न पर टफ चेकिंग के साथ बच्चों की परीक्षाएं ली और माशिमं ने होम सेंटर में परीक्षा के बाद मूल्यांकन कार्य को शिथिल कर धड़ल्ले से नंबर बांटे।


बच्चों ने कॉपियां पूरी ब्लैंक छोड़ दी है। एक प्रश्न का उत्तर तक नहीं लिख पाए। बच्चों को लगा कि वे कोरोना की तरह इस बार भी पास हो जाएंगे। बच्चे अभी भी कोरोना काल से उबरे नहीं है। इसलिए नतीजे इस तरह आ रहे हैं।

डॉ. आरएन सिंह, प्राचार्य, दुर्ग साइंस कॉलेज

Story Loader