
Doctors' Day: जंगल में देश सेवा और दुश्मनों का इलाज करने में माहिर है फौजी डॉ. आकांक्षा
कोमल धनेसर @भिलाई. हम हैं ना... डॉक्टर की ओर से बोला गया यह चंद शब्द बीमार व्यक्ति को अपनेपन का अहसास कराता है। डॉक्टर्स डे पर पत्रिका आपको रूबरू करा रहा है आपके आसपास के उन डॉक्टरों से जो फौज में हैं और अपने मानव सेवा के संकल्प से फौजी साथियों और जरूरतमंदों का इलाज कर रहे हैं साथ एक फौजी की तरह मौका आने पर अपनी बंदूक से देश के दुश्मनों का भी इलाज कर देते हैं..।
दिल में देशभक्ति का जज्बा लिए जंगल में घूम रही अकांक्षा
उम्र महज 28 साल, पर दिल में देशभक्ति का जज्बा ऐसा कि अच्छे-अच्छे जवान भी इसके सामने ना टिक पाए। जितनी शिद्दत से वह लोगों का इलाज करती हैं उतने ही प्यार से लोग उसे फौजी डॉक्टर बुलाते हैं। जी हां आईटीबीपी में 38 बटालियन की मेडिकल ऑफिसर डॉ. आकांक्षा सिंह ऐसी ही शख्सियत हैं। जो बड़े अस्पतालों के एसी रूम को छोड़कर जंगलों में घूम-घूम कर लोगों का इलाज कर रही है।
उनका मानना है कि जहां सरकारी महकमा नहीं पहुंच पाता, वहां लोग फोर्स से अपनी उम्मीदें रखना शुरू करते हैं। संवेदनशील माओवादी क्षेत्र में कई ऐसे गांव आज भी हंै जहां डॉक्टर तो दूर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भी समय पर नहीं खुलता। ऐसे में आईटीबीपी की सीओबी में बना छोटा सा कमरा गांव वालों की जिंदगी बचाता है। जब उनके इलाज से मरीज ठीक होकर जाते हैं और बदले में दुआ देते हैं तो लगता है जैसे कोई मैडल मिल गया हो।
वर्दी का नशा ही कुछ और
आकांक्षा ने बचपन से ही अपने पापा को आईटीबीपी की वर्दी में देखा तो उससे अलग ही लगाव हो गया। एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की और पापा की ही फोर्स ज्वाइन करने का फैसला लिया। डॉ आकांक्षा बताती है कि प्रोफेशनल डिग्री के साथ वे आईटीबीपी में आई पर यहां की ट्रेनिंग ने उसे इतना स्ट्रांग बना दिया कि वह बर्फीली बॉर्डर से लेकर छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में अपने आप को आसानी से ढाल सकती हैं।
चाहे कई किलोमीटर पैदल ही क्यों ना चलना पड़े पर मरीज को वे बिना इलाज के नहीं छोड़ती। वे बताती हैं कि पिछले डेढ़ साल से वे एक मोबाइल हॉस्टिपल की तरह काम कर रही हैं। एडीपी के साथ रात में भी वे सर्चिंग पर जाती हैं तो दिन में भी गांवों में जाकर लोगों का इलाज करती हैं।
वीमंस को मिला फायदा
डॉ आकांक्षा की पोस्टिंग 2014 में बिहार के छपरा में हुई थी। दूसरी पोस्टिंग पर वह छत्तीसगढ़ आ गई जहां आईटीबीपी की बटालियन तैनात है। उन्होंने बताया कि एक लेडिज डॉक्टर होने के नाते गांव की महिलाओं को काफी फायदा मिला।
खासकर वीमंस हेल्थ और हाईजीन को लेकर वे गांव की महिलाओं के बीच पहुंची तो उनकी झिझक दूर हुई और वे खुलकर अपनी परेशानी शेयर करने लगी। जो अब तक किसी मेल डॉक्टर से कभी शेयर नहीं की थी। आज जंगल में रहने वाली महिलाएं भी सैनेटरी नैपकीन को यूज करना सीख गई है जो उनकी सेहत के लिए सबसे ज्यादा जरूरी था।
Published on:
01 Jul 2018 04:36 pm
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