
त्याग व तप के साथ दुगुर्णों से दूर रहने के प्रयासों पर चिंतन जरूरी - मणिप्रभाश्री
दुर्ग. मनुष्य भव भाग्योदय है। इसमें पुरूषार्थ से निरंतर बदलाव आता हैं। इस भव में त्याग और तप में रूचि रखकर भी हम अपने ह्दय के भावों को निंदा, राग-द्वेष आदि दुर्गुणों से मुक्त करने का कितना प्रयास कर रहे हैं, यह आत्मचिंतन का विषय है। उक्त बातें जिनकुशल दादाबाड़ी में चातुर्मासिक आध्यामिक प्रवचन में साध्वी मणिप्रभाश्री ने कही।
सुसंस्कारों से अपने ह्दय को जोड़कर स्वयं को जानने का प्रयास करें
मणिप्रभाश्री ने कहा कि मनुष्य भव में जन्म हमारे भाग्योदय से हुआ है, लेकिन बचपन से वृद्धावस्था तक निरंतर बदलाव में त्याग, तप, संयम में रूचि रखकर भी हमने अपने आत्मभाव को पापमुक्त करने की ओर कितना प्रयास किया यह चिंतन जरूरी है। आत्मचिंतन से भाव बदला जा सकता है। अच्छे भाव अच्छे संस्कारों से भावजगत से अच्छाई बढ़ती है। भाव ही हमें पाषाण प्रतिमा में परमात्मा को प्रतिबिंबित कराता है और हम परमात्मा के दर्शन कर आत्मा सुख की अनुभूति करते है। उन्होंने कहा कि मनुष्यभव सद्गुणों को बढ़ाने के लिए है, हमें दूसरों की चौकीदारी कर, उनके दुर्गुणों के प्रचार की अपेक्षा स्वयं को आत्मचिंतन कर दुर्गुणों से मुक्त करने का पुरूषार्थ करना चाहिए। मनुष्यभव में सह्दयता, सज्जनता, और सुसंस्कारों से अपने ह्दय को जोड़कर स्वयं को जानने का प्रयास करें।
अच्छाई स्वीकारने से सुधरता है दृष्टिकोण
दृष्टिकोण परिवर्तन की महत्ता बतलाते हुए साध्वी ने कहा कि हमारा ह्दय जैसे-जैसे अच्छाई स्वीकारने लगता है दूसरों के प्रति हमारे भाव और दृष्टिकोण भी बदलनें लगते है। दूसरों के प्रति तुलना दृष्टिकोण में निरंतर कमी आती है और उनके प्रति ईष्र्या द्वेष कम होकर सद्भाव, सद्विचार विकसित होते है।
स्वयं की कमियां जानकर बढ़े पुण्य मार्गपर
साध्वी मणिप्रभाश्री ने कहा कि संकल्पशक्ति स्वयं में निहित है। आत्मा के स्पर्श से हम स्वयं की कमियों को जानकर उन्हें दूर कर पुण्यकृत जीवन मार्ग पर बढ़ सके, इसका प्रयास करना चाहिए। जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के प्रचार-प्रसार मंत्री अमृत लोढ़ा ने बताया कि चातुर्मास प्रवचन में अन्य समाज के लोग भी बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं।
Published on:
29 Jul 2018 06:40 pm
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