भिलाई. हौसले बुलंद हो तो मंजिल मिल ही जाती है। इस जुमले को भिलाई के हाऊसिंग बोर्ड में रहने वाले युवा खिलाड़ी श्रीमंत झा ने सच कर दिखाया है। दिव्यांग होने के बावजूद उनके कदम आगे बढ़ते रहे। ना उम्मीदी से कोसों दूर रहने का हुनर ही है, जो उन्हें सबसे खास बनाता है। पैरा आर्म रेसलिंग खिलाड़ी श्रीमंत ने एशियन चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीत लिया है।
डिसेबल्ड 80 किग्रा वजन वर्ग में टीम को ब्रॉन्ज मेडल दिलाया
इस उपलब्धि ने जहां प्रदेश का मान बढ़ाया है, तो वहीं यह भी साबित किया है कि संसाधनों का अभाव हौसले को डगमगा नहीं सकता। कजाकिस्तान में आयोजित टूर्नामेंट में श्रीमंत ने सीनियर कैटेगरी डिसेबल्ड 80 किग्रा वजन वर्ग में टीम को ब्रॉन्ज मेडल दिलाया। उन्होंने देश का प्रतिनिधित्व किया। गुरुवार को श्रीमंत पत्रिका भिलाई कार्यालय पहुंचे, जहां उनकी इस कामयाबी को सेलिब्रेट किया गया। श्रीमंत ने अपने अनुभव साझा किए।
सरकार से क्या मिला सिर्फ आश्वासन
श्रीमंत ने आर्म रेसलिंग में देश को कई मेडल दिलाए हैं, बावजूद इसके राज्य सरकार ने उन्हें सिवाय आश्वासन के कुछ नहीं दिया। विदेशों में होने वाले टूर्नामेंट में शामिल होने के लिए जब वित्त का अभाव सामने आया तो सरकार के जिम्मेदार विभागों ने हाथ खींचा। परिवार, नाते-रिश्तेदार और दोस्तों की मदद से टूर्नामेंट में शामिल होने का खर्च जुटाया। ये गजब का हौसला ही है, जिसनेे कभी हार नहीं मानने दी।
हार नहीं मानने देता जज्बा
श्रीमंत का कहना है कि छत्तीसगढ़ में भी अब सिर्फ क्रिकेट को ही बड़ा खेल माना जाता है, यही वजह है कि राज्य सरकार पैरा रेसलिंग के जैसे खेलों को तवज्जो नहीं देती। दिव्यांग खिलाड़ी जो देश का प्रतिनिधित्व कर मेडल अपने नाम करते हैं, उनकी मदद करना तो दूर प्रोत्साहित तक नहीं किया जाता। श्रीमंत के दोनों हथेलियों की उंगलियां पूरी तरह से विकसीत नहीं हो पाई हैं, लेकिन खेल के प्रति उनका जुनून उन्हें हार मानने नहीं देता। वे इंडिया में लगातार 5 सालों से 75 केजी वेट में नंबर वन आर्म रेसलर हैं। पहले बुल्गारिया में हुए चैंपियनशिप में श्रीमंत को छठा स्थान मिला, इसके अलावा कई देशों में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीता है।