
हिंदुओं की इकलौती पूजा जिससे बच्चों को रखा जाता है दूर, जानिए क्यों दशहरे के दिन सेना भी करती हैं शस्त्र पूजा
भिलाई. कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के बीच इस दशहरा यानी विजयदशमीं पर्व की तैयारी शुरू हो गई। 15 अक्टूबर को पूरे देश में धूमधाम से दशहरा मनाया जाएगा। नवरात्रि के दसवें दिन विजदशमी का पर्व मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष महत्व है। बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक, इस त्योहार से जुड़ी अनेक मान्यताएं हैं। इसी दिन अच्छाई की जीत ने रावण का वध किया था। साथ ही यह भी मान्यता है कि मां दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था। देशभर में इसे अलग-अलग नामों, अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में इसे आयुध पुजाई के नाम से जाना जाता है। वहीं महाराष्ट्र में इसे खंडे नवमीं के मान से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे शस्त्र पूजन नाम से जाना जाता है।
इसलिए की जाती है शस्त्र पूजा (Shastra puja)
दशहरा के दिन शस्त्र पूजन करने की परंपरा सदियों पुरानी है। आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी को शस्त्र पूजन का किया जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा के पूजन के बाद दशहरे का त्योहार मनाया जाता है। विजयदशमी पर मां दुर्गा का पूजन किया जाता है। मां दुर्गा शक्ति का प्रतीक हैं। इस दिन आत्मरक्षार्थ रखे जाने वाले शस्त्रों की भी पूजा की जाती है। हथियारों की साफ-सफाई की जाती है और उनका पूजन होता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन किए जाने वाले कामों का शुभ फल अवश्य प्राप्त होता है। यह भी कहा जाता है कि शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए इस दिन शस्त्र पूजा करनी चाहिए।
हर साल भारतीय सेना और पुलिस भी करती है शस्त्र पूजा
दशहरा के दिन शस्र पूजा के महत्व का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस दिन सेना और पुलिस में भी शस्त्र पूजा का विधान है। शस्त्र पूजा में मां दुर्गा की दोनों योगनियां जया और विजया की पूजा की जाती है, और फिर शस्त्र पूजन होता है। इस पूजा से हर युद्ध में जीत और सीमाओं की सुरक्षा का वचन मां से लिया जाता है।
पूजा से नाबालिग बच्चों को रखा जाता है दूर
हिंदुओं की यूं तो हर पूजा में बच्चों को खासतौर से शामिल किया जाता है लेकिन शस्त्र पूजा की इकलौती पूजा है जिसमें बच्चों को दूर ही रखा जाता है। ताकि इन बच्चों को किसी भी तरह की हिंसक प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन ना मिले। शस्त्र पूजा के दौरान बलि देने की भी परंपरा है। अब पशुओं की बजाय सांकेतिक रूप से रखिया की बलि दी जाती है।
शस्त्र पूजा की विधि
इस दिन शस्त्रों की पूजा पूरे विधि विधान से की जाती है। जिसके लिए सबसे पहले सभी शस्त्रों को एक जगह पर रखा जाता है। इसके बाद पूरी विधि की जाती है।
सबसे पहले शस्त्रों पर गंगाजल छिड़कते हैं।
सभी हथियारों को हल्दी व कुमकुम लगाया जाता है।
शस्त्रों को फूल अर्पित किए जाते हैं।
शमी के पत्तों को शस्त्रों पर चढ़ाकर पूजा की जाती है।
Published on:
12 Oct 2021 05:56 pm

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