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दोनों पैर से विकलांग यह युवक अपने कदमों में झुकाएगा अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी को

अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी किलिमन्जारो पर तिरंगा फहराने के इरादे से रवाना हुआ छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के बेलोदी गांव का दिव्यांग चित्रसेन।

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Disabled Mountaineer Chitrasen

दोनो पैर से दिव्यांग पर्वतारोही चित्रसेन

बालोद. दोनों पैर से विकलांग है, मगर हौसला बुलंदी पर। पर्वत की ऊंची चोटी को भी अपने कदमों में झुकाने के इरादे से निकला यह युवक मजबूत इरादे की मिसाल है। इस इरादे को पूरा करने के लिए उसने बकायदा डेढ़ साल का कठिन प्रशिक्षण लिया है। जब उसने खुद को तैयार कर लिया तो वह अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी किलिमन्जारो की चढ़ाई करने मंगलवार को फ्लाइट से रवाना हो गया।

बालोद जिले के गुंडरदेही ब्लॉक के ग्राम बेलोदी निवासी 27 साल के दोनो पैर से दिव्यांग चित्रसेन 20 सितम्बर को अफ्रीका की इस सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ाई शुरू करेंगे और वहां तिरंगा फहराएंगे। गांव के इस लाडले बेटे की इस हौसले को देख गांव के लोग उसकी कामयाबी की प्रार्थना कर रहे हैं। यह बालोद जिले का पहला युवक है जो पर्वतारोहण के लिए प्रशिक्षण लेकर रवाना हुआ है।

19 हजार फीट की ऊंचाई पर प्रोस्थेटिक लैग से करेंगे चढ़ाई
हाउसिंग बोर्ड में सिविल इंजीनियर के पद पर कार्यरत 27 साल के ब्लेड रनर चित्रसेन साहू अफ्रीका महाद्वीप की सबसे ऊंची चोटी किलिमंजारो पर तिरंगा फहराने के लिए 20 सितंबर से चढ़ाई शुरू करेंगे। अगर सबकुछ ठीक रहा तो वे 24 सितंबर की शाम या फिर 25 सितंबर की सुबह 19 हजार फीट यानी 5895 मीटर ऊंचाई पर तिरंगा फहराएंगे।

पहले 14 हजार फीट ऊंची चोटी पर चढ़ चुके चित्रसेन
एक दुर्घटना में अपने दोनों पैर खो चुके चित्रसेन किलिमंजारो फतह करने के लिए पिछले डेढ़ साल से प्रैक्टिस कर रहे हैं। इससे पहले वो हिमाचल के पहाड़ पर 14 हजार फीट ऊंची चोटी चढ़ चुके हैं। यही नहीं, मैनपाट सहित राज्य के कई छोटे-बड़े माउंटेन पर भी चित्रसेन ने चढ़ाई की है। वे छत्तीसगढ़ के पहले ऐसे व्यक्ति हैं जो दोनों पैर न होने के बावजूद प्रोस्थेटिक लैग और बुलंद हौसले के दम पर किलिमंजारो फतह करने के लिए रवाना हुए हैं।

पैर कटा तो अरुणिमा की बुक से मिली हिम्मत, अब खुद बन गए मोटिवेटर
4 जून 2014 को बिलासपुर से अपने घर (ग्राम बेलोदी, जिला बालोद) जाने के लिए मैंने अमरकंटक एक्सप्रेस पर सवार हुआ था। प्यास लगने पर मैं पेयजल लेने भाटापारा स्टेशन में उतरा। थोड़ी देर में ट्रेन का हॉर्न बजते ही चढऩे के लिए मैं दौड़ा। मेरा पैर फिसलकर ट्रेन के बीच में फंस गया। दुर्घटना के अगले ही दिन एक पैर डॉक्टरों ने काट दिया। इसके ठीक 24 दिन बाद इंफेक्शन के कारण दूसरा पैर भी मजबूरी में काटना पड़ा। वह क्षण जिंदगी का सबसे बुरा दौर था। समझ ही नहीं आ रहा था कि आगे क्या होगा। इस बीच काफी मुश्किलें आईं। फैमिली और दोस्तों ने हर कदम पर साथ दिया। इसके बाद पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा की बुक लांच होने की खबर मिली। उनकी कहानी पढ़कर मेरा हौसला बढ़ा। फरवरी 2015 में जयपुर कृत्रिम पैर लगाकर मैंने धीरे-धीरे चलना शुरू किया और जून में प्रोस्थेटिक लैग लगा लिया। स्कूल और कॉलेज की पढ़ाईके दौरान मेरी स्पोट्र्स में खास दिलचस्पी रही है। प्रोस्थेटिक लैग लगने के बाद दोबारा खेलना शुरू किया। व्हीलचेयर पर बास्केटबॉल खेलने लगा। इस खेल की वुमंस टीम भी बनाई है, उन्हें 2017 से ट्रेनिंग दे रहा हूं। अगर मेरी तरह कोई व्यक्ति किसी हादसे का शिकार हो जाता है तो हॉस्पिटल जाकर मैं उनसे मिलता हूं। हिम्मत हारने के बजाय उन्हें जिंदगी से लडऩे और जीतने के लिए मोटिवेट करता हूं।

आसान नही सफर पर मुश्किल भी नही
चित्रसेन ने बताया कि इस एवरेस्ट पर चढ़ाई करना आसान नहीं है, लेकिन नामुमकिन भी नहीं। मेरे दोनों पैर प्रोस्थेटिक लैग हैं। जिनका एक पैर प्रोस्थेटिक होता है और एक रियल, वो चढ़ाई के दौरान दूसरे पैर की ताकत का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। मुझे दोनों प्रोस्थेटिक लैग पर एनर्जी लगाकर चढ़ाई करना है, लेकिन डेढ़ साल की प्रैक्टिस के बाद अब मैं इसके लिए पूरी तरह तैयार हूं।