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संकट से नहीं उबर पा रहा सूक्ष्म व लघु उद्योग

नोटबंदी से कपड़ा, रियल एस्टेट सहित अन्य कारोबार किसी तरह संभले ही थे कि जीएसटी लगाकर सरकार ने छोटे उद्यमियों की कमर तोड़ दी

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नोटबंदी से कपड़ा, रियल एस्टेट सहित अन्य कारोबार किसी तरह संभले ही थे कि जीएसटी लगाकर सरकार ने छोटे और मझोले उद्यमियों (एमएसएमई) की कमर तोड़ दी

भीलवाड़ा।
नोटबंदी से कपड़ा, रियल एस्टेट सहित अन्य कारोबार किसी तरह संभले ही थे कि जीएसटी लगाकर सरकार ने छोटे और मझोले उद्यमियों (एमएसएमई) की कमर तोड़ दी। हालत यह है कि जीएसटी लागू होने के बाद तो जैसे एमएसएमई सेक्टर से जुड़े कारोबारियों का व्यापार धीरे-धीरे संकट में उलझता जा रहा है। विशेषतौर पर कपड़ा व्यापारियों को कई परेशानियां उठानी पड़ रही है।

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किसी भी व्यापारी को जीएसटी भरने में आपत्ति नहीं है, लेकिन जीएसटी की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि व्यापार से ज्यादा इसी में उलझे रहते हैं। आलम यह है कि सीए भी जीएसटी की प्रक्रिया में उलझ जाते हैं। कई प्रक्रिया ऐसी हैं जो अधिकारियों के समझ के भी बाहर है। ई-वे बिल से लेकर, आईटीसी-4 और जीएसटीआर-1 ने व्यापारियों की नींद खराब कर रखी है। 274 दिन बीत जाने के बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। अब एक अप्रेल से ई-वे बिल लागू होने जा रहा है। वहीं आईटीसी-4 भी व्यापारियों के लिए कम सिर दर्द नहीं है।

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व्यापारियों और उद्यमी वर्ग से बाचतीत के बाद ये बातें उभर कर आई। व्यापारियों का कहना था कि जीएसटी लागू होने के बाद रक्षाबंधन , नवरात्र, दुर्गा पूजा, दीपावली व वैवाहिक सीजन में भी व्यापार तेजी नहीं पकड़ पाया, जबकि हर साल इन सीजनों में व्यापारी अच्छा व्यापार कर लेते थे। व्यापारियों का कहना है कि जीएसटी लागू होने के बाद से कोई भी सीजन अच्छा नहीं गया। हालांकि स्कूल ड्रेस का सीजन चलने से बड़े उद्यमियों के साथ जॉब पर काम करने वाले सौ से अधिक उद्यमियों को ही इसका फायदा मिल पा रहा है। जबकि वस्त्रनगरी में450 वीविंग इकाइयां है। दो हजार से अधिक ट्रेडर्स है। इसके लिए हजारों की संख्या में कपड़ा व्यापारी।


कपड़े व्यापारी परेशान
मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे, वित्तमंत्री अरुण जेटली , कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी , वित्त मंत्री राज्य अर्जुन मेघवाल, भीलवाड़ा सांसद
सुभाष बहेडिय़ा और राजस्व सचिव हसमुख अढिय़ा सहित कई मंत्रियों और अधिकारियों से से कपड़ा व्यापारी और अन्य औद्योगिक संगठनों के लोग मिले। प्रक्रिया में सरलीकरण का आश्वासन भी दिया, लेकिन राहत आज तक नहीं मिली। इसके चलते कपड़े का उत्पादन भी लगातार कम होता जा रहा है। इसके चलते कई पावरलूम मशीन तो बिक चुके।


इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाने की अधिसूचना नहीं हो सकी जारी
एक जुलाई से पहले इम्पोर्ट फेब्रिक पर 28 प्रतिशत ड्यूटी लगती थी, जो जीएसटी लागू होने के बाद 10 प्रतिशत रह गई। इसके कारण इम्पोर्ट फेब्रिक की तुलना में स्थानीय मार्केट का कपड़ा काफी महंगा हो गया। भारत में कपड़ा उत्पादन करने के बजाय व्यापारी भी इम्पोर्ट फेब्रिक सस्ते में लेने लगे। इसकी वजह से इम्पोर्ट फेब्रिक बढ़ गया और एक्सपोर्ट कम हो गया।

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