
Dwarpalo Kanhaiya ... but the devotees farewell in bhilwara
भीलवाड़ा।
संत सत्यानंद महाराज ने कहा कि जो व्यक्ति गृहस्थ रहते हुए भी वैराग्य के साथ जीवन यापन करता है। अनेक प्रकार की इच्छाओं और वासनाओं से मुक्त रहता है। हर हाल में संतुष्ट व तृप्त रहता है। वहीं व्यक्ति भगवान का सच्चा भक्त कहलाता है। सत्यानंद शनिवार को शास्त्रीनगर स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर छात्रावास में चल रही भागवत कथा के समापन पर उपस्थित सैकड़ों श्द्धालुओं को कृष्ण-सुदामा मित्रता प्रसंग पर संबोधित कर रहे थे। कथा के दौरान संत ने अरे द्वारपालो कन्हैया से कह दो कि दर पर सुदामा गरीब आ गया है...। भजन गाया तो श्रद्धालु झूमने लगे व महिलाएं नृत्य करने लगी। पांडाल में चारों ओर जय श्री राधे का जय घोष होने लगा।
उन्होंने कहा कि कृष्ण ने मित्र सुदामा का इतना सम्मान किया जितना राजा महाराजा का भी नहीं होता होगा। काफी बड़े होने के बाद भी वे अपने सच्चे मित्र को नहीं भूले। बाहर से कोई बड़ा छोटा नहीं होता है। ध्यान और संतोष की आंतरिक संपदा जिसके पास है वही बड़ा है। हर क्षेत्र में अध्ययन की आवश्यकता है एक स्कूल में अध्यापक, बैंक में क्लर्क की, अपने क्षेत्र में इंजीनियर की भी योग्यता होती है उसी प्रकार जो व्यासपीठ पर बैठकर धर्म का उपदेश दे रहा है उसकी योग्यता, शिक्षा और ज्ञान विराट होना चाहिए। आज कोई भी व्यासपीठ पर बैठकर उपदेश कर रहा है। व्यासपीठ पर बैठने से पहले प्राचीन गुरुकुल पद्धति से वेद शास्त्रों का विधि पूर्वक अध्ययन करना पड़ता है। किसी योग्य गुरु के सान्निध्य में अध्यात्म विद्या को पढऩा पड़ता है। आयोजन समिति के ललितशंकर शर्मा ने बताया कि कथा के दौरान भगवान कृष्ण और सुदामा की झांकी सजाई गई जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी।

Published on:
27 Oct 2018 05:25 pm
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