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भीलवाड़ा

पहले दौड़ती थी वाटर ट्रेन, चम्बल के पानी ने खोले समृद्धि के द्वार

-अब हमें निभाना है फर्ज, अदा करना है नदी का कर्ज, जल बचाएंगे तो खुलेंगे किस्मत के द्वार -भीलवाड़ा के लिए चम्बल परियोजना बनी वरदान, जनता को जलसंकट से मिली राहत -विकास के खोले नए द्वार, उद्योगों को उड़ान भरने में बन रहा मददगार

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छह साल पहले कई दशकों तक टेक्सटाइल सिटी भीलवाड़ा में पीने के पानी को लेकर कितने विकट हालात थे। किसी से छिपे नहीं है, लेकिन वर्ष 2016 में चम्बल परियोजना ऐसा वरदान बनकर आई कि भीलवाड़ा में समृद्धि व खुशहाली के द्वार खुल गए। चम्बल के पानी के कारण शहरी विकास से लेकर उद्योगों के विकास में पंख लग रहे हैं। हर घर में नल से चम्बल का पानी आ रहा है। वस्त्रनगरी की तस्वीर बदल रही है।

148 किलोमीटर दूर भैसरोडगढ़़ से गुजर रही चम्बल नदी का पानी भीलवाड़ा पहुंचा है। इस समय रोजाना 800 लाख लीटर पानी चम्बल से लिया जा रहा है। शहर की पांच लाख आबादी की प्यास बुझाने के साथ पानी गांव-ढाणी तक पहुंच रहा है। पानी की कमी पूरी होने से अब औद्योगिक विकास को भी पंख लगे हैं। जिले के दो हजार गांवों में परियोजना का पानी पहुंच चुुका है, जबकि शेष गांवों को चम्बल का पानी पिलाने के लिए पाइप लाइन बिछाने, उच्च क्षमता की टंकियां व स्टोरज टैंक बनाने का काम तेजी से चल रहा है। छह साल से लोग चम्बल का पानी पी रहे हैं। चम्बल नदी ने अपना फर्ज पूरा किया। अब लोगों को पानी के मोल को समझते इसकी बर्बादी रोककर अपना दायित्व निभाना होगा।


वर्ष-2016 में वाटर ट्रेन किया बाय-बाय
भीलवाड़ा के लिए वर्ष-2016 सौगात बनकर आया था। 7 नवम्बर 2016 को निर्बाध रूप से चम्बल का पानी शहर को मिलने लगा था। पहले फेज में शहर में जलापूर्ति हुई। दूसरे फेज में गांवों को आपूर्ति शुरू की गई। चम्बल आने से पहले डेढ़ दशक से शहर जलसंकट से जूझ रहा था। मानसून के दगा देने के बाद से वाटर ट्रेन शहर की प्यास बुझाने के लिए दौड़ती थी। पहले नसीराबाद से बीसलपुर का पानी लाया जाता और उसके बाद कोटा से चम्बल का पानी लेकर ट्रेन भीलवाड़ा आती थी। चम्बल का पानी आने के बाद से वाटर ट्रेन को लोगों ने बाय-बाय कह दिया।

125 नलकूप बंद, घटा ककरोलिया और मेजा से भार-
भीलवाड़ा शहर में चम्बल का पानी आने से पूर्व भीलवाड़ा की प्यास मेजा बांध और ककरोलिया घाटी पर टिकी थी। जलदाय विभाग ने चम्बल के पानी से पेयजल संकट को दूर करने के लिए 125 नलकूप भी खुदवाए थे। उसे पेयजल आपूर्ति करते थे। चम्बल का पानी आने से इनका भार कर हो गया।

पहले फेज पर 3600 करोड़ का खर्चा-
सरकार के ड्रिम प्रोजेक्ट में चम्बल परियोजना शामिल थी। भाजपा और कांग्रेस दोनों सरकारों ने इसे प्राथमिकता में रखा। यही वजह है परियोजना पर अब तक 3600 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। पहले फेज में शहर को पानी पिलाने का लक्ष्य रखा गया। उसके बाद दूसरे फेज में गांव को पानी पिलाने की तैयारी हुई। चम्बल परियोजना को वर्ष- 2045 की संभावित मांग को देखते हुए सतही स्तर पर उतारा गया।

1082 करोड़ की योजना और स्वीकृत-
भीलवाड़ा शहर और जिले में पेयजल की बढ़ती मांग को पूरा करने और आबादी के अनुसार वर्ष-2054 के अनुसार जलदाय विभाग ने सरकार को नया प्लान बनाकर भेजा था। सरकार ने 1082 करोड़ रुपए की स्वीकृति दी है। चित्तौडगढ़़ और राजसमंद के साथ भीलवाड़ा की आगामी पेयजल आपूर्ति को भी पूरा करेगा। भीलवाड़ा शहर की साठ कॉलोनियों तक भी पानी पहुंचाया जा सकेगा। नई योजना के तहत 55 लीटर प्रति व्यक्ति पानी देने का खाका खींचा गया है।
आरोली प्लांट : जहां से चम्बल का पानी शुद्ध होकर घरों तक पहुंच रहा
भीलवाड़ा जिले के आरोली में चम्बल परियोजना का फिल्टर प्लांट है। भीलवाड़ा से अस्सी किलोमीटर दूर प्लांट में एक बार में 2500 लाख लीटर पानी फिल्टर हो सकता है। भैसरोडगढ़़ के निकट से बह रही चम्बल का पानी यहां पहुंचाया जाता है। यहां पानी शुद्ध करने के बाद भीलवाड़ा में सप्लाई होता है।
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फैक्ट फाइल

148 किमी दूर से आ रहा चम्बल का पानी
800 लाख लीटर इस समय रोजाना चम्बल से आपूर्ति
3600 करोड़ का अब तक हो चुका खर्चा
24 उच्च जलाशय शहर में आपूर्ति के लिए बनाए गए
110 जोन बनाकर की जा रही आपूर्ति
5 लाख शहर की जनसंख्या पर चम्बल का वरदान
साल 2054 का ध्यान रखकर खींचा चम्बल का खाका
55 लीटर प्रति व्यक्ति पानी देने की योजना