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पर्यावरण में जहर घोल रहा सेफ्टी टैंकों काला पानी

भयावह : ब्लैक वाटर नालियों से मिल रहा नदियों में

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Environment poisoning in environment Safety Tanks water in bhilwara

Environment poisoning in environment Safety Tanks water in bhilwara

भीलवाड़ा।


Safety Tanks black water घरों के सैफ्टी टैंकों से निकलने वाला दूषित पानी (ब्लैक वाटर) पर्यावरण में जहर घोल रहा है। जिस क्षेत्र में यह पानी जा रहा है, वहां का पानी दूषित हो रहा है। इस दूषित पानी का समाधान नहीं किया तो स्थिति भयावह हो सकती है। घरों में काम वाले टॉयलेट क्लीनर व साबुन के पानी से भी ज्यादा खतरा पैदा हो गया है। प्रदेश के वैज्ञानिक चिंतित हैं। केन्द्र व राज्य सरकार ने इसके समाधान के लिए योजना बनाई है।

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केन्द्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग ने देश में बनाए सभी शौचालयों को सोखता गड्ढ़ों (लीच पीट) से जोडऩे को कहा। शहरी क्षेत्रों के सैफ्टी टैंकों से निकलने वाले ब्लैक वाटर के निस्तारण के लिए सीवरेज योजना जल्द पूरा करने को कहा गया।


बिना लीज पीट के शौचालयों पर रोक

Safety Tanks black water सरकार ने सोखता गड्ढ़ों (लीच पीट) के अलावा अन्य सभी शौचालयों पर रोक लगा रखी है। जिले में अधिकांश शौचालय सोखता गड्ढ़ों (लीच पीट) के आधार पर बने हैं लेकिन फिर भी २० प्रतिशत ऐसे शौचालय हैं, जिनका ब्लैक वाटर बाहर निकल रहा है। ऐसे शौचालयों का गंदा पानी पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। यह खुले में शौच जाने से भी ज्यादा खतरनाक है। जिस घर या पंचायत में सेप्टिक टैंक या पाइप वाले शौचालय है, उस घर, पंचायत को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) नहीं करने पर भी विचार किया जा रहा है। सोखता गड्ढ़ों वाले शौचालय भी आसानी ने बन सकते है। इसमें कम पानी की जरूरत होती है। बदबू नहीं होती, मल खाद में बदल जाता है। बार-बार भरने का झंझट नहीं। सेप्टिक टैंक वाले शौचालय पर 50 हजार से ज्यादा खर्च। ज्यादा पानी की जरूरत। गंदगी घुलकर बाहर आती है। इससे बदबू, मक्खी-मच्छर पैदा होते हैं।


जल्दबाजी में बने बिना लीच पीट शौचालय

जिले को ओडिएफ घोषित कराने के चक्कर में कई पंचायतों में बिना सोखता गड्ढ़ों के शौचालय बना लिए। अब इनको सुधारने के लिए केन्द्र ने एक शौचालय के तीन हजार रुपए का बजट दिया है। यह कार्य स्वच्छाग्रही की टीम के सान्निध्य में होगा।

टॉयलेट क्लीनर व साबुन का पानी घातक
शौचालयों को पानी व ब्रश से साफ किया जाता था। कुछ सालों से घर में टॉयलेट क्लीनर का उपयोग तेजी से बढ़ा है । महिलाएं कपड़े धोने के बाद साबुन का पानी भी टॉयलेट में डाल देती है। इससे कीटाणु जो अपना काम करते थे, वह टॉयलेट क्लीनर व साबुन के पानी के साथ मिलकर मर रहे हैं। इस कारण पानी के साथ मल सीधा नालियों में निकल रहा है। जो पर्यावरण को क्षति पहुंचा रहा है।
डॉ. सीपी गोस्वामी, आरसीएचओ भीलवाड़ा

ब्लैक वाटर पर्यावरण के लिए घातक
सैफ्टी टैंकों से निकलने वाला ब्लैक वाटर पर्यावरण के लिए घातक हो सकता है। शहरी क्षेत्रों में सीवरेज आने से इस समस्या का समाधान होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में इससे खतरा ज्यादा है। क्योंकि वहा सीवरेज अभी नहीं है। जिले में ऐसे शौचालयों का सर्वे करावा रहे है जो बिना सोखता गड्ढ़ों के बने है।
राजेन्द्र भट्ट जिला कलक्टर