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अंतरराष्ट्रीय फड चित्रकार श्रीलाल जोशी ‘बाउसा ‘ नहीं रहे

अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित वरिष्ठ चित्रकार पद्मश्री श्रीलाल जोशी का शुक्रवार को निधन हो गया

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अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित वरिष्ठ चित्रकार पद्मश्री श्रीलाल जोशी का शुक्रवार को निधन हो गया। वे 89 वर्ष के थे। उनका अंतिम संस्कार शनिवार सुबह पंचमुखी धाम स्थित मोक्षधाम में किया गया।

भीलवाड़ा।

अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित वरिष्ठ चित्रकार पद्मश्री श्रीलाल जोशी का शुक्रवार को निधन हो गया। वे 89 वर्ष के थे। उनका अंतिम संस्कार शनिवार सुबह पंचमुखी धाम स्थित मोक्षधाम में किया गया। उनके पुत्र अंतरराष्ट्रीय चित्रकार कल्याण जोशी व गोपाल जोशी ने मुखाग्नि दी। अंतिम संस्कार से पूर्व जिला कलक्टर मुक्तानंन्द अग्रवाल व पुलिस अधीक्षक प्रदीप मोहन शर्मा ने जोशी के सांगानेरी गेट स्थित निवास स्थल पहुंच कर पार्थिव शरीर पर पुष्प चक्र चढ़ा कर श्रद्धाजलि अर्पित की। अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या मेंकला प्रेमी समेत विभिन्न वर्ग के लोग मौजूद थे।

श्रीलाल जोशी गत दो सप्ताह से सांस की बीमारी से परेशान थे और निमोनिया की शिकायत के चलते उन्हे आरसी व्यासनगर स्थित निजी चिकित्सालय में भर्ती कराया गया था । यहां उन्होंने शुक्रवार शाम पांच अंतिम सांस ली। जोशी का जन्म 5 मार्च 1929 को जिले के शाहपुरा कस्बे में हुआ था, उन्होंने फड़ चित्रकारी में देश ही नहीं अपितु विदेश में अपनी अमिट छाप छोड़ी। वे वर्ष में 2005 पद्मश्री से सम्मानित हुए। वर्ष 2006 में शिल्पगुरू पुरूस्कार से राष्ट्रपति ने सम्मानित किया। इससे पूर्व1984 वे राष्ट्रपति पुरस्कार से भी नवाजे गए। उनकी कृला कृतियों का प्रदर्शन बीस से अधिक देशों में हुआ। विश्व के प्रसिद्ध संग्रहालयों में भी उनकी कलाकृतियां लगी हुई है। जोशी पर सरकार ने डाक टिकट भी जारी किया। उन्हें प्रदेश, देश एवं विदेश में अनेकों पुरस्कार प्रदान किए गए।

जोशी पेंटिंग के पारंपरिक कलाकारों के रूप में जाने जाते रहे है। उनके पिता रामचंद्र जोशी ने 13 साल की उम्र में ही उन्हें इस पारंपरिक पारिवारिक कला में शामिल कर लिया। पिछले छह दशकों में उन्होंने अपने काम के माध्यम से राजस्थान की लोक चित्रकला की विभिन्न शैलियों में समृद्ध अनुभव प्रदर्शित किया है। उन्होंने समकालीन शैली विकसित करके फ ड चित्रकला की कला को पहचान और प्रसिद्धि का नया आयाम प्रदान किया है। उन्होंने अपनी खुद की शैली विकसित की है। उन्होंने कई नई तकनीकों की खोज की और काफ ी मौलिक और सार्थक रचनाओं को चित्रित किया। वह फड के अलावा अपने भित्ति व दीवारों चित्रों के लिए भी प्रसिद्ध थे। अपनी दीवार पेंटिंग के लिए शिल्प संग्रहालयए नई दिल्ली से राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। वे प्राचीन फ्रे स्को शैली में दीवार पेंटिंग करते थे। हाथी, घोड़े, शेर और सिर पर घड़ा लिए हुए महिलाएं उनके चित्रों के सामान्य रूपांकन था।

इतिहास को चित्रों में उतारा
उन्होंने देवनारायण महागाथा, हल्दीघाटी की लड़ाई और पद्मिनी का जौहर, महाराणा प्रताप का जीवन, पृथ्वी राज चौहान, रानी हाड़ा, रानी पद्मिनी, ढोला मारू, अमर सिंह राठौड़, बुद्ध, महावीर और गीत गोविन्दम की कहानी, रामायण, महाभारत और कुमारसंभव धारावाहिक के प्रसंगों के आधार पर इस पारंपरिक कला के लिए नए विषयों के साथ छोटे आकर की फड चित्रकला चित्रित तथा प्रस्तुत की है। उनके पुत्र कल्याण और गोपाल की भी फडचित्रकला में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान है।